अतिक्रमण की परतों में दफ्न हज्जन का कुआं, क्या फिर उजागर होगी ज्वालापुर में ऐतिहासिक पहचान
मोहम्मद आरिफ उत्तराखंड क्राइम प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। ज्वालापुर की पहचान केवल बाजारों और ऐतिहासिक गलियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां के पुराने कुएं, बावड़ियां और जल स्रोत भी कभी स्थानीय जीवन का अहम हिस्सा हुआ करते थे। इन्हीं में एक नाम था ‘हज्जन का कुआं’, जो वर्षों पहले पूरे इलाके में अपनी पहचान रखता था। एक समय ऐसा था जब यह स्थान लोगों की दिनचर्या और सामाजिक जीवन का केंद्र माना जाता था, लेकिन बदलते वक्त के साथ इसकी पहचान धीरे-धीरे धुंधली पड़ती चली गई। स्थानीय लोगों के अनुसार, कभी मोहल्ला कैतवाड़ा इलाका ‘हज्जन के कुएं’ के नाम से जाना जाता था। लोग यहां से पानी भरते थे और यह स्थान मोहल्ले की पहचान का प्रतीक था। लेकिन जैसे-जैसे आधुनिक जल आपूर्ति व्यवस्था बढ़ी, कुओं का उपयोग कम होता गया और फिर बंद हो गया। इसके बाद कथित तौर पर इस ऐतिहासिक कुएं पर अतिक्रमण की परतें चढ़ती चली गई। जानकारों के अनुसार बताया जाता है कि कुएं को एक सीमित दायरे में कैद कर दिया गया और समय के साथ उसका स्वरूप व नाम तक लगभग खत्म हो गया। हालत यह है कि नई पीढ़ी के लोगों को यहां तक मालूम नहीं कि यहां कभी ‘हज्जन का कुआं’ हुआ करता था, जो मोहल्ले की पहचान माना जाता था। वर्तमान में प्रदेश सरकार द्वारा अतिक्रमण हटाने के अभियान को तेजी से लागू किया जा रहा है। अतिक्रमण के स्थानों को मुक्त किया जा रहा है। ऐसे में स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि प्रशासन गंभीरता से जांच कर कार्रवाई करे, तो वर्षों से अतिक्रमण की चादर में दबा हज्जन का कुआं फिर से सामने आ सकता है। चर्चा यह भी है कि कुएं के आसपास की भूमि पर भी अवैध कब्जे के आरोप लगते रहे हैं, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक मानी जा रही है। इतिहास और विरासत केवल किताबों में नहीं, बल्कि शहर की जमीन और उसकी स्मृतियों में भी बसती है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ज्वालापुर में अतिक्रमण की भेट चढ़ा कुआं अपनी खोई हुई पहचान को फिर से हासिल कर पाएगा, या हज्जन का कुआं समय की धूल में यूं ही गुम रह जाएगा।









