
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(नीटू कुमार) हरिद्वार। हरिद्वार शहर में लोहड़ी पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। वहीं, श्रवण नाथ नगर स्थित गली में लोहड़ी पर्व हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

इस मौके पर सर्दी की ठंडी शामों में जलती हुई अलाव की लपटें, मखाने, रेवड़ी, गजक और मूंगफली की खुशबू और लोक गीतों की धुनें हर तरफ गूंजती रही।

इस मौके पर क्षेत्रवासी रोहिनी चौहान ने कहा कि लोहड़ी का संबंध सूर्य देव और अग्नि देव से है। किसान सूर्य की किरणों को धन्यवाद देते हैं, क्योंकि वे फसल को पकाने में मदद करती हैं।

आज पूरे उत्तर भारत, खासकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। कहा कि सर्दी की ठंडी शामों में जलती हुई अलाव की लपटें, मखाने, रेवड़ी, गजक और मूंगफली की खुशबू और लोक गीतों की धुनें हर तरफ गूंज रही हैं।

यह पर्व न केवल फसल की कटाई का उत्सव है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक भी है। इस मौके पर क्षेत्रवासी सुनीता शर्मा, ज्योति व शिवानी ने संयुक्त रूप से कहा कि एक गरीब ब्राह्मण या किसान सुंदरदास की दो सुंदर बेटियां सुंदरी और मुंदरी थीं। वे अनाथ या गरीब परिवार से थीं। जमींदार या मुगल सरदारों की बुरी नजर उन पर थी।

लड़कियों की सगाई तय थी, लेकिन डर से ससुराल वाले शादी से इनकार कर रहे थे। दुल्ला भट्टी को इसकी खबर मिली। उन्होंने तुरंत कार्रवाई की। उन्होंने लड़कियों को मुक्त कराया। इसके बाद जमींदार को सबक सिखाने के लिए उसके खेत जला दिए।

फिर, लोहड़ी के दिन जंगल में बड़ा अलाव जलाकर हिंदू रीति-रिवाज से उनकी शादी योग्य हिंदू लड़कों से करवाई। दुल्ला ने खुद कन्यादान किया, जैसे पिता की भूमिका निभाई। विदाई करने के लिए उनके पास ज्यादा कुछ नहीं था, इसलिए एक सेर शक्कर देकर विदा किया। कुछ कथाओं में गुड़-तिल का जिक्र है।











