भारत के मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पण धन और प्रशासनिक जिम्मेदारी: श्वेता शर्मा
राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। भारत की आत्मा सनातन परंपरा में बसती है। यहाँ मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, सेवा और सामाजिक चेतना के केंद्र रहे हैं। सदियों से श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार मंदिरों में दान और चढ़ावा अर्पित करते आएं हैं। यह दान किसी अपेक्षा के साथ नहीं, बल्कि विश्वास के साथ दिया जाता है—इस विश्वास के साथ कि यह धन धर्म, सेवा और समाज के हित में लगेगा। आज देश के अनेक प्रमुख मंदिरों में हर वर्ष हज़ारों करोड़ रुपये का धन भेंट स्वरूप दान आता है। यह धन किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों का है जो अपनी मेहनत की कमाई ईश्वर के चरणों में अर्पित करते हैं। किसान, श्रमिक, गृहिणियाँ, बुज़ुर्ग—सभी के योगदान से यह धार्मिक संपदा बनती हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि इस धन के उपयोग को लेकर समाज में जिज्ञासा भी है और अपेक्षा भी। वर्तमान व्यवस्था में कई मंदिरों का प्रशासन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी नियंत्रण में है। मंदिरों की आय, व्यय, नियुक्तियाँ और प्रबंधन से जुड़े अनेक निर्णय प्रशासनिक ढांचे के अधीन आते हैं। जब मंदिरों का धन प्रशासन के अधीन हो, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उस धन की जिम्मेदारी भी उतनी ही स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए। श्रद्धालु यह जानना चाहता है कि उसका दान कहाँ और किस उद्देश्य से उपयोग में लाया जा रहा है। यह चिंता इसलिए भी गहरी होती है क्योंकि अनेक पवित्र स्थल आज भी अव्यवस्था से जूझते देखे जा सकते हैं। कहीं स्वच्छता की कमी है, कहीं अवैध अतिक्रमण मंदिर परिसरों की पवित्रता को प्रभावित कर रहा है, तो कहीं दर्शन व्यवस्था श्रद्धालुओं के लिए कष्टदायक बनी रहती है। यदि मंदिरों की आय इतनी व्यापक है, तो मूलभूत सुविधाओं और पवित्रता की रक्षा में यह कमी क्यों दिखाई देती है—यह प्रश्न किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि व्यवस्था की समीक्षा के लिए है। सनातन परंपरा में दान का उद्देश्य केवल संचय नहीं, बल्कि सेवा और लोककल्याण रहा है। मंदिरों से जुड़े गुरुकुल, वेद-पाठशालाएँ, साधु-संतों की सेवा, तीर्थ क्षेत्रों का संरक्षण, गरीब और असहाय श्रद्धालुओं की सहायता—ये सभी कार्य मंदिर-धन के स्वाभाविक उपयोग माने जाते हैं। जब इस दिशा में स्पष्ट जानकारी और पारदर्शिता का अभाव होता है, तो आस्था के साथ-साथ भरोसा भी प्रभावित होता है। यह विषय आस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने का नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा के लिए जिम्मेदारी तय करने का है। सनातन दर्शन हमेशा आत्ममंथन और सुधार का मार्ग दिखाता रहा है। इसलिए मंदिरों के धन के उपयोग पर प्रश्न उठाना विरोध नहीं, बल्कि जागरूकता का संकेत है। प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ प्रशासनिक उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है। आज आवश्यकता है कि मंदिरों के आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक रूप से सुलभ हो, ताकि श्रद्धालु निश्चिंत रह सके कि उसका दान उचित दिशा में उपयोग हो रहा है। पारदर्शिता से न केवल अविश्वास दूर होता है, बल्कि व्यवस्था भी सशक्त होती है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आस्था से उपजा संसाधन आस्था की मर्यादा, संस्कृति और समाज के उत्थान में ही लगे। मंदिरों की पवित्रता केवल धार्मिक विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। जब प्रशासन मंदिरों के धन का प्रबंधन करता है, तो उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह इस धन को उसी श्रद्धा और संवेदनशीलता के साथ देखे, जिस भावना से श्रद्धालु इसे अर्पित करता है। आस्था तभी सुरक्षित रह सकती है, जब व्यवस्था उसे सम्मान दे। जहाँ प्रशासनिक व्यवस्था और सनातन आस्था एक-दूसरे के पूरक बनें। यदि मंदिरों का धन जिम्मेदारी, पारदर्शिता और उद्देश्यपूर्ण ढंग से उपयोग में लाया जाए, तो न केवल पवित्र स्थल सुदृढ़ होंगे, बल्कि समाज का विश्वास भी और अधिक मजबूत होगा। यही सनातन परंपरा की सच्ची सेवा है।









