
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(चिराग कुमार) हरिद्वार। नई दिल्ली स्थित भारत मण्डपम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समिट को संबोधित करते हुए साउथ एशियन इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड रिकॉन्सिलिएशन (एसएआईपीआर) के अध्यक्ष एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) 21वीं सदी की सबसे प्रभावशाली तकनीकों में से एक बन चुकी है। एसएआईपीआर के अध्यक्ष डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि आज जब विश्व अनिश्चितता के भंवर में फंसा हुआ है, जहाँ एक ओर जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियाँ हमारे सामने खड़ी हैं—वहीं दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का तीव्र विकास मानव इतिहास के एक निर्णायक मोड़ का संकेत दे रहा है। ऐसे समय में मानवता का भविष्य हमारी प्रत्येक चर्चा, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक नीति के केंद्र में होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि इस एआई शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यदि कोई है, तो वह है—‘विश्वास’। विश्वास केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि उस मानव विवेक पर केन्द्रित है, जो उसे दिशा देता है। विश्वास केवल एल्गोरिदम पर नहीं, बल्कि उन मूल्यों पर जो उन्हें संचालित करते हैं। युगऋषि पं0 श्रीराम शर्मा आचार्यश्री द्वारा दिये गये सूत्र को याद करते हुए कहा कि प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने जब मानवता पर संकट के बादल छा जाते हैं, तब उद्धार की राह भी उसी के भीतर से निकलती है। क्योंकि विनाश का कारण चाहे मनुष्य बने, पर सृजन और पुनर्निर्माण की क्षमता भी उसी में निहित है। मानवता ही वह शक्ति है जो स्वयं को संभालकर संसार को फिर से प्रकाश की ओर ले जा सकती है। वैदिक ग्रंथ के प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख करते हुए प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि अक्सर कहा जाता है कि जब संपूर्ण मानवता पर कोई संकट गहराता है, तब उस संकट से उबरने की शक्ति भी मानवता के भीतर ही जागृत होती है। हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा, विशेषकर संस्कृत की कालजयी भावना हमें यही सिखाती है कि मनुष्य की सामूहिक चेतना और सहअस्तित्व की भावना उसे हर विनाशकारी परिस्थिति से ऊपर उठाने में सक्षम बनाती है। यूनेस्को की सुश्री गैब्रिएला रामोस, एनवाईयू की शांति संस्था की सुश्री मरीन कॉलिन्स रैगनेट तथा ग्लोबेथिक्स के पाओला गैल्वेज ने भी एआई पर विश्वास अब वैश्विक अनिवार्यता विषय पर अपने अपने विचार रखे।









