जब देवी स्थलों और मां गंगा की पवित्रता खतरे में हो: श्वेता शर्मा
राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। लाखों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद धरती पर अवतरित हुई मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और मोक्ष की धारा हैं। जिनके सम्मान में स्वयं भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया, जिनके स्पर्श मात्र से मानव का कल्याण होता है और पापों से मुक्ति मिलती है आज उन्हीं मां गंगा का अस्तित्व संकट में दिखाई दे रहा है। यह संकट कहीं बाहर से नहीं आया, यह हमारे अपने आचरण का परिणाम है। गंगा में गिरता सीवर का पानी, गटर की गंदगी, प्लास्टिक और कचरा हमारी लापरवाही को दर्शाते हैं। हम यह सब देखते हैं, समझते हैं, फिर भी अनदेखा कर देते हैं। ऐसे में गंगा घाटों पर होने वाली आरती का अर्थ भी कहीं न कहीं अधूरा लगने लगता है। गंगोत्री क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। यह केवल प्रकृति का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। हम वहां तक पहुंचने की सुविधाएं तो बना रहे हैं, लेकिन यह नहीं सोच रहे कि कहीं यह सुविधा ही गंगा के अस्तित्व के लिए संकट न बन जाए। शास्त्रों में उल्लेख है कि कलयुग के प्रभाव में मां गंगा अपने धाम को लौट जाएंगी। क्या हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं—यह सोचने का विषय है।
यदि गंगा हमसे दूर हो गईं, तो उन क्षेत्रों का क्या होगा, जिनका जीवन उन्हीं पर निर्भर है? उत्तर और पूर्व भारत में जल, जीवन और खेती का आधार मां गंगा ही हैं। केवल योजनाएं बना देने या बजट पास कर देने से क्या गंगा को बचाया जा सकता है, या फिर छोटे-छोटे सच्चे प्रयास ही उनका संरक्षण कर सकते हैं यह प्रश्न आज हमारे सामने है। गंगा में स्नान के बाद कपड़े वहीं छोड़ देना, घाटों पर कूड़ा फैलाना या असंयमित आचरण करना उनकी मर्यादा का अपमान है। हम उन्हें “मां” तो कहते हैं, पर क्या वास्तव में मां जैसा सम्मान देते हैं? केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से यह सिद्ध करना होगा। जब भी गंगा घाटों की स्थिति देखी जाती है, तो वह समय स्मरण हो आता है जब उनके एक स्पर्श के लिए लोगों ने तपस्या की थी, पीढ़ियों ने अपने प्राण अर्पित कर दिए थे। आज आवश्यकता है कि हम उसी श्रद्धा को पुनः अपने जीवन में स्थान दें। इसी संदर्भ में देवभूमि उत्तराखंड की स्थिति भी हमें सोचने के लिए विवश करती है। यहां कहीं मां गंगा को दूषित किया जा रहा है, तो कहीं हरे-भरे वृक्षों को काटकर प्रकृति के संतुलन के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। इसके साथ ही देवी स्थलों की मर्यादाएं भी प्रभावित हो रही हैं। तीर्थ स्थान केवल घूमने के लिए नहीं होते, वे श्रद्धा और शांति के केंद्र होते हैं। वहां स्वच्छता, संयम और मर्यादा आवश्यक है, लेकिन बढ़ती भीड़ और गंदगी इनकी गरिमा को आहत कर रही है। ऐसे में यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रदूषण पर नियंत्रण करे, वनों की रक्षा करे और तीर्थ स्थलों की पवित्रता बनाए रखे। साथ ही हम सबका भी यह कर्तव्य है कि अपने आचरण से इस पवित्रता को बनाए रखें। यदि हम सच में मां गंगा को “मां” मानते हैं, तो उनके प्रति अपने कर्तव्य को भी उसी श्रद्धा से निभाना होगा। यही सच्ची भक्ति है, यही सच्चा धर्म है।









