केवल बुद्धि को शिक्षित करना पर्याप्त नहीं, भावनाओं को समझना भी आवश्यक: शिवानी गौर

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(लेखिका) हरिद्वार। शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना, परीक्षाओं में सफलता हासिल करना और भविष्य में एक अच्छा करियर बनाना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे व्यक्ति का निर्माण करना है, जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संवेदनशील, जिम्मेदार और संतुलित भी हो। लेकिन आज की प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा व्यवस्था में हम बच्चों की बौद्धिक क्षमता पर जितना ध्यान देते हैं, उनकी भावनात्मक दुनिया पर उतना ध्यान नहीं दे पाते। आज का बच्चा अनेक प्रकार के दबावों से गुजर रहा है-अच्छे अंक लाने का दबाव, माता-पिता की अपेक्षाएँ, दोस्तों से तुलना, प्रतियोगिता और सोशल मीडिया का प्रभाव। हर बच्चा अपनी परेशानी शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता। कोई चुप हो जाता है, कोई चिड़चिड़ा व्यवहार करने लगता है और कोई अपनी भावनाओं को भीतर ही दबाता रहता है। एक शिक्षक के रूप में हम अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ देखते हैं। मान लीजिए, कोई बच्चा लगातार कक्षा में बात करता है और गृहकार्य पूरा नहीं करता। पहली दृष्टि में वह लापरवाह या अनुशासनहीन लग सकता है। लेकिन जब शिक्षक उसे डाँटने के बजाय कुछ समय देकर उसकी बात सुनता है, तो पता चलता है कि घर की किसी समस्या या पढ़ाई को लेकर उसके भीतर असुरक्षा है। ऐसी स्थिति में केवल दंड देने के बजाय उसकी भावनात्मक स्थिति को समझना अधिक प्रभावी हो सकता है। इसी तरह, परीक्षा में कम अंक पाने वाला कोई बच्चा यह मान सकता है कि वह अपने सहपाठियों से कम योग्य है। यदि हम उससे केवल यह कहें कि तुमने मेहनत नहीं की, तो उसका आत्मविश्वास और कम हो सकता है। इसके बजाय यदि शिक्षक उसे समझाए कि एक परीक्षा किसी व्यक्ति की पूरी क्षमता का प्रमाण नहीं होती, और फिर उसके साथ मिलकर सुधार की योजना बनाए, तो असफलता उसके लिए सीखने का अवसर बन सकती है। भावनात्मक शिक्षा का अर्थ यह नहीं कि पढ़ाई को छोड़कर केवल भावनाओं की बातें की जाएँ। इसका अर्थ है बच्चों को अपनी भावनाओं को पहचानना, क्रोध और निराशा को नियंत्रित करना, असफलता को स्वीकार करना, दूसरों के प्रति सहानुभूति रखना और स्वस्थ संबंध बनाना सिखाना। उदाहरण के लिए, यदि दो विद्यार्थी किसी छोटी-सी बात पर झगड़ते हैं, तो शिक्षक केवल यह कहकर बात समाप्त कर सकता है कि दोनों एक-दूसरे से माफी माँगो। लेकिन यदि वह दोनों को अपनी-अपनी बात शांतिपूर्वक रखने का अवसर दे और उनसे पूछे कि तुम्हें उस समय कैसा लगा? तो बच्चे केवल माफी माँगना ही नहीं, बल्कि दूसरे की भावनाओं को समझना भी सीखेंगे। यही भावनात्मक शिक्षा है। विद्यालयों में कहानी, समूह-चर्चा, भूमिका-अभिनय, डायरी लेखन और छोटे-छोटे चिंतनात्मक अभ्यासों के माध्यम से इन जीवन-कौशलों को शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है। बच्चों को यह भी समझाना आवश्यक है कि सहायता माँगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं के प्रति जागरूकता है। माता-पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि बच्चा घर आकर कहता है, आज मेरे बहुत कम अंक आए, तो तुरंत तुलना करने के बजाय उससे यह पूछना अधिक उपयोगी होगा, तुम्हें कैसा लग रहा है? तुम्हें किस जगह कठिनाई हुई? इससे बच्चा परिणाम छिपाने के बजाय अपनी समस्या साझा करना सीखेगा। अंततः शिक्षा का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जाना चाहिए कि बच्चे ने कितने अंक प्राप्त किए, बल्कि इससे भी कि उसने एक बेहतर इंसान बनना कितना सीखा। हमें बच्चों को केवल जीवन में सफल होने की कला नहीं, बल्कि सफलता और असफलता-दोनों को संतुलित होकर स्वीकार करने की क्षमता भी देनी होगी।
क्योंकि एक शिक्षित मस्तिष्क सफलता प्राप्त कर सकता है, लेकिन एक संवेदनशील और भावनात्मक रूप से परिपक्व हृदय ही उस सफलता को सार्थक बना सकता है।









