देहरादून

नवरात्रि के शुभ अवसर पर विशेष: श्वेता शर्मा

राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। नवरात्रि का सातवां दिन जगज्जननी भगवती के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की उपासना को समर्पित है। काल अर्थात समय और मृत्यु का संहार करने वाली महाशक्ति होने के कारण इन्हें ‘कालरात्रि’ कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नामक दैत्यों ने देवलोक में भयंकर उत्पात मचाया और देवताओं को पराजित कर दिया, तब समस्त देवता भगवती की शरण में पहुँचे। जब देवी कौशिकी (पार्वती) का युद्ध रक्तबीज से हुआ, तब रक्तबीज के शरीर से गिरती हुई रक्त की प्रत्येक बूँद से सैकड़ों नए दैत्य उत्पन्न होने लगे। तब देवी पार्वती ने अपने भाल से अति-भयंकर कृष्णवर्णी ‘कालरात्रि’ (चामुंडा) रूप प्रकट किया। माँ कालरात्रि ने अपने विकराल रूप से रक्तबीज के रक्त की एक भी बूँद भूमि पर नहीं गिरने दी और उसका सम्पूर्ण रक्त पीकर रक्तबीज तथा शुंभ-निशुंभ की विशाल असुरी सेना का समूल विनाश किया।
माँ कालरात्रि का स्वरूप बाहर से अत्यंत भयानक और उग्र प्रतीत होता है, परंतु भीतर से यह अत्यंत कल्याणकारी और भक्तों को अभय प्रदान करने वाला है, इसी कारण इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। देवी का वर्ण अंधकार के समान पूर्णतः काला है। इनके केश बिखरे हुए हैं, गले में विद्युत के समान चमकने वाली माला है और इनके तीनों नेत्र सूर्य के समान गोल व कांतिमान हैं। इनकी नासिका से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती हैं। देवी चार भुजाओं वाली हैं, जिनके दाहिने हाथ अभय और वरदमुद्रा में हैं तथा बाएँ हाथों में लोहे का काँटा (कटार) और खड्ग सुशोभित हैं। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है। तंत्र-शास्त्र और योग साधना के अनुसार, सप्तम नवरात्र की रात्रि (‘कालरात्रि/निशा पूजा’) को साधक का ध्यान सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra) में स्थित होता है। माँ कालरात्रि की साधना से साधक का सहस्रार चक्र जाग्रत होता है, जिससे उसे समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों, अष्ट सिद्धियों, अलौकिक ज्ञान और तंत्र-मंत्र के भय से मुक्ति प्राप्त होती है। मां कालरात्रि के सिद्धपीठ देश भर में तंत्र और शक्ति साधना के महान केंद्र माने जाते हैं। कोलकाता स्थित अति-प्राचीन कालीघाट शक्तिपीठ तथा वीरभूम का तारापीठ देवी के इसी उग्र व संहारक स्वरूप की तंत्र साधना के सर्वोच्च धाम हैं। इसके अतिरिक्त, हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थित महाकाली मंदिर और मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित गढ़कालिका सिद्धपीठ में भी माँ कालरात्रि का प्राचीन व चमत्कारी पूजन स्थल विद्यमान है, जहाँ पौराणिक काल में महाकवि कालिदास ने सिद्धि अर्जित की थी। सप्तम नवरात्र के दिन साधक को रात्रि काल में नीले या लाल वस्त्र धारण कर देवी की आराधना करनी चाहिए। माँ कालरात्रि की पूजा में रात रानी या गुड़हल के पुष्प, नीलांबर वस्त्र और गुड़ या गुड़ से बने पकवानों का भोग लगाने का विशेष शास्त्रीय विधान है। माँ को गुड़ का भोग अर्पित करने से साधक के जीवन से अकाल मृत्यु, आकस्मिक दुर्घटनाएँ, रोग तथा शत्रुओं का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। देवी की असीम अनुकंपा प्राप्त करने के लिए साधक इस ध्यान-मंत्र का जप करते हैं, अर्थ: एक वेणी (चोटी) धारण करने वाली, जपाकुसुम (गुड़हल) के पुष्प से अलंकृत, नग्न स्वरूप वाली, गधे पर सवार, लंबे होंठों वाली, लोहे के काँटेदार अस्त्रों से सुशोभित और अंधकार के समान काले वर्ण वाली माँ कालरात्रि मेरे समस्त भयों का नाश करें। जो भक्त सातवें नवरात्र की पावन रात्रि को निष्काम भाव और पूर्ण निष्ठा से माँ कालरात्रि की कथा सुनते हैं, ध्यान-मंत्र का जप करते हैं और उनकी आरती उतारते हैं, ‘शुभंकरी’ माँ उनके जीवन से भूत-प्रेत, ग्रह-बाधा, शत्रु और अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर उन्हें परम अभय, सुख, समृद्धि और सिद्धि प्रदान करती हैं।

Related Articles

Back to top button