हरिद्वार

आस्था से पर्यावरण तक: ग्लोबल विज्डम के छात्र ने मंदिरों के फूलों को दी नई पहचान

गगन शर्मा सह सम्पादक

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। हरिद्वार के घाटों और मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए फूल आस्था और श्रद्धा का प्रतीक होते हैं। लेकिन पूजा-अर्चना के बाद यही पवित्र पुष्प अक्सर कचरे का हिस्सा बन जाते हैं और कई बार गंगा में पहुँचकर प्रदूषण का कारण भी बनते हैं। स्कूली छात्र मौलिक जैन के लिए यह केवल कचरा प्रबंधन का विषय नहीं था, बल्कि एक ऐसे प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास था-क्या श्रद्धा से अर्पित फूलों को प्रदूषण बनने से पहले नया जीवन दिया जा सकता है? इसी सोच से जन्म हुआ ‘अमृत धारा’ का, जो मंदिरों में चढ़ाए गए पुष्पों को एकत्रित कर उन्हें पर्यावरण-अनुकूल धूप कोन और समब्राणी कप में परिवर्तित करती है। इस पहल का उद्देश्य है कि जो फूल श्रद्धा से अर्पित किए गए हैं, वे प्रकृति के लिए बोझ न बनें। इस पहल की शुरुआत वर्षों से चले आ रहे मौलिक के पर्यावरणीय अध्ययन से हुई। उन्होंने गंगा के जल की गुणवत्ता का अध्ययन किया, जिसमें पीएच, टर्बिडिटी, टोटल डिज़ॉल्व्ड सॉलिड्स तथा बैक्टीरिया जैसे मानकों का विश्लेषण किया। जल शोधन के लिए देशी पौधों पर आधारित प्राकृतिक कोएगुलेंट्स पर उनका शोध बाद में ‘कोंवेर्जन्स’ शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ। इसी दौरान उनके मन में एक विचार आया-यदि प्रदूषित पानी को साफ़ करना आवश्यक है, तो प्रदूषण को गंगा तक पहुँचने से पहले ही क्यों न रोका जाए? इस प्रश्न का उत्तर उन्हें हरिद्वार के मंदिरों और घाटों पर प्रतिदिन एकत्र होने वाले त्यागे गए फूलों में मिला। उन्होंने मंदिरों में जाकर पुष्प निस्तारण की प्रक्रिया को समझा और महसूस किया कि इन पवित्र पुष्पों को पुनः उपयोग में लाकर पर्यावरण संरक्षण और आजीविका, दोनों को साथ जोड़ा जा सकता है। आज अमृत धारा के अंतर्गत फूलों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है, प्लास्टिक व अन्य अशुद्धियाँ हटाई जाती हैं, उन्हें सुखाकर प्राकृतिक बाइंडरों के साथ मिलाया जाता है और हाथों से धूप उत्पाद तैयार किए जाते हैं। अमृत धारा का अब तक का प्रभाव ये रहा कि पुनर्चक्रित पवित्र पुष्प अर्पण 1000 किलोग्राम निर्मित पर्यावरण-अनुकूल धूप 45000 उत्पाद और 8 महिला आजीविकाओं को मिला सहयोग मिला है, 12 मंदिर एवं घाट साझेदारी द्वारा 110 सामुदायिक स्वयंसेवकों की भागीदारी रही। इस जागरूकता अभियानों से 3500 नागरिक लाभान्वित हुए। यह पहल स्थानीय स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के साथ मिलकर कार्य करती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सम्मानजनक आजीविका के अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

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