शिक्षा: समाज परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति: शिवानी गौर
"जब एक बच्चा किताबों से दूर होता है, तब वह केवल शिक्षा से नहीं, बल्कि अपने सपनों से भी दूर होने लगता है"

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(लेख) हरिद्वार। शिक्षा मानव जीवन का वह प्रकाश है जो व्यक्ति को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान, जागरूकता और विकास के मार्ग पर ले जाता है। यह केवल पढ़ने और लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के विचारों, व्यवहार और व्यक्तित्व का निर्माण भी करती है। शिक्षा व्यक्ति को सही और गलत की पहचान करने की क्षमता देती है तथा उसे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने योग्य बनाती है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसकी शिक्षा व्यवस्था और उसके शिक्षित नागरिकों पर निर्भर करती है।
वर्तमान समय में विज्ञान और तकनीक ने विश्व को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया है, लेकिन आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा के अभाव में अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। शिक्षा की कमी केवल व्यक्ति को पीछे नहीं रखती, बल्कि समाज में कई सामाजिक समस्याओं को भी जन्म देती है। बाल श्रम, भिक्षावृत्ति, गरीबी, बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता जैसी अनेक समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं अशिक्षा से जुड़ी हुई दिखाई देती है।
बाल श्रम हमारे समाज की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। बच्चों की उम्र खेलने, सीखने और अपने सपनों को आकार देने की होती है, लेकिन अनेक बच्चे मजबूरी और शिक्षा के अभाव में छोटी उम्र में ही काम करने लगते हैं। उनके हाथों में किताबों और पेंसिल की जगह श्रम का बोझ आ जाता है। जो बच्चे विद्यालय में होने चाहिए, वे कारखानों, दुकानों और सड़कों पर काम करते दिखाई देते हैं। ऐसे बच्चे धीरे-धीरे अपने बचपन के साथ-साथ अपने भविष्य के अवसरों को भी खोने लगते हैं।
इसी प्रकार भिक्षावृत्ति की समस्या भी समाज में तेजी से बढ़ती दिखाई देती है। अनेक लोग शिक्षा के अभाव में रोजगार के अवसर प्राप्त नहीं कर पाते और परिस्थितियों के कारण जीवनयापन के लिए गलत या कठिन रास्तों का सहारा लेने लगते हैं। यदि व्यक्ति को उचित शिक्षा और कौशल प्राप्त हो, तो वह आत्मनिर्भर बन सकता है और अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकता है।
शिक्षा केवल आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का भी आधार है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझता है। वह समाज में फैली कुरीतियों, भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस रखता है। शिक्षा महिलाओं को सशक्त बनाती है, लैंगिक समानता को बढ़ावा देती है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंत में, यह कहा जा सकता है कि साक्षरता केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति का आधार भी है। यदि हमें एक मजबूत, जागरूक और विकसित समाज बनाना है, तो शिक्षा को हर व्यक्ति तक पहुंचाना आवश्यक है। क्योंकि शिक्षित समाज ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
शिवानी गौर—संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन मूल्यों पर लिखने वाली स्वतंत्र लेखिका









