भावनात्मक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन-जब विश्वास और सम्मान दोनों टूटने लगते हैं: शिवानी गौर
शिवानी गौर लेखिका हरिद्वार

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवानी गौर) लेखिका। हम अक्सर मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा तनाव, अवसाद, चिंता या अकेलेपन के संदर्भ में करते हैं। लेकिन मानसिक संतुलन का एक और गहरा आधार है-विश्वास और सम्मान। विश्वास वह अदृश्य शक्ति है जो रिश्तों को जोड़कर रखती है, और सम्मान वह आधार है जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने देता है। जब लोग अपनी बातों पर टिकना छोड़ देते हैं, वादे परिस्थितियों के अनुसार बदलने लगते हैं और सम्मान केवल अपने लोगों तक सीमित रह जाता है, तब इसका प्रभाव केवल कुछ रिश्तों तक नहीं रहता; यह पूरे समाज के भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। आज हमारे आसपास एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है जिसमें लोग संबंधों में उपस्थित तो दिखते हैं, परंतु प्रतिबद्ध नहीं होते। शब्द बदल जाते हैं, इरादे बदल जाते हैं और जिम्मेदारियाँ सुविधा के अनुसार बदल दी जाती हैं। धीरे-धीरे यह सामान्य व्यवहार माना जाने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ भावनात्मक असुरक्षा जन्म लेती है। विश्वास का टूटना केवल दिल नहीं तोड़ता, वह व्यक्ति के मानसिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। बार-बार टूटे हुए भरोसे के बाद मन संदेह से भरने लगता है। व्यक्ति दूसरों पर ही नहीं, स्वयं पर भी विश्वास खोने लगता है। वह हर संबंध में आशंका, तुलना और असुरक्षा लेकर प्रवेश करता है। परिणामस्वरूप चिंता, अनिद्रा, भावनात्मक थकान और आत्मसम्मान में गिरावट जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं। लेकिन समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। मानसिक संतुलन का एक और महत्वपूर्ण आधार है-सम्मान की व्यापक भावना। आज समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती दिखाई देती है जो अत्यधिक परिवार-केंद्रित या स्व-केंद्रित होकर यह मान बैठते हैं कि संवेदना, नैतिकता और सम्मान केवल उनके अपने लोगों के लिए है। परिवार के बाहर का व्यक्ति उनके लिए केवल एक साधन, एक अवसर या एक उपयोगी संसाधन बन जाता है। ऐसे लोग दूसरों की भावनाओं, गरिमा और अधिकारों को उतना महत्व नहीं देते जितना अपने हितों को देते हैं। यहीं से समाज का वास्तविक संकट शुरू होता है। जब किसी समाज में मनुष्य, मनुष्य न रहकर उपयोग की वस्तु बन जाता है, तब संबंधों की आत्मा समाप्त होने लगती है। यह प्रवृत्ति छल, भावनात्मक शोषण, अवसरवाद और अविश्वास को जन्म देती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे लोग बाहर से जिम्मेदार, सफल और सामाजिक रूप से सम्मानित दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके व्यवहार में सार्वभौमिक मानवीय सम्मान का अभाव होता है। वे अपने परिवार की रक्षा करते हुए भी समाज की संवेदनशीलता को कमजोर कर सकते हैं।
इसका प्रभाव केवल वर्तमान पर नहीं, आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि वे यह अनुभव करते हैं कि वादे निभाने के लिए नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार बदल देने के लिए होते हैं, और सम्मान केवल अपने लोगों के लिए सुरक्षित है, तो उनके भीतर भी संबंधों के प्रति अस्थिरता विकसित होती है। ऐसे में परिवार, मित्रता, विवाह और सामाजिक सहयोग-सभी संस्थाएँ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं। एक समाज केवल कानूनों से सुरक्षित नहीं होता, वह विश्वसनीय और सम्मानशील लोगों से सुरक्षित होता है। जब किसी समाज में लोगों के शब्दों का मूल्य कम हो जाता है और दूसरों की गरिमा का सम्मान समाप्त होने लगता है, तो वहाँ सहयोग की जगह संदेह, संवाद की जगह दूरी और संवेदना की जगह स्वार्थ बढ़ने लगता है। यह स्थिति सामाजिक रूप से अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि अविश्वास और अनादर मिलकर सामूहिक मानसिक असंतुलन को जन्म देते हैं।
भावनात्मक स्वास्थ्य का अर्थ केवल खुश रहना नहीं है; इसका अर्थ है ऐसा वातावरण जहाँ व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और भरोसे के योग्य महसूस करे। इसलिए मानसिक संतुलन की शुरुआत किसी दवा से पहले चरित्र से होती है। अपने शब्द पर टिकना, वादा निभाना, स्पष्ट संवाद करना, दूसरों की गरिमा का सम्मान करना और संबंधों में ईमानदार रहना-ये केवल नैतिक गुण नहीं हैं, बल्कि सामाजिक मानसिक स्वास्थ्य की आधारशिला हैं। यदि हम वास्तव में एक स्वस्थ समाज चाहते हैं, तो हमें अपने बच्चों को केवल सफल होना नहीं, बल्कि विश्वसनीय और सम्मानशील होना भी सिखाना होगा। क्योंकि जब विश्वास बचा रहता है, तब संबंध बचते हैं; जब सम्मान बचा रहता है, तब मनुष्यता बची रहती है और जब मनुष्यता बची रहती है, तभी मानसिक संतुलन और समाज दोनों सुरक्षित रहते हैं।









