जयदेव मिनान के सुरों का जादू, ‘सरू कुमैण’ ने जीता पहाड़ का दिल
राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। पहाड़ सिर्फ ऊंचे-नीचे रास्तों, बर्फीली चोटियों और कल-कल बहती नदियों का नाम नहीं, बल्कि वह एक ऐसी जीवंत संस्कृति है, जिसकी धड़कन लोकगीतों में सुनाई देती है। इन दिनों इसी लोकधुन और पहाड़ी माटी की खुशबू को अपने सुरों में समेटे गीत ‘सरू कुमैण’ संगीत प्रेमियों के बीच खासा आकर्षण बटोर रहा है।
गीत को अपनी सधी हुई और प्रभावशाली आवाज देने वाले जयदेव मिनान (जेडी) ने अपनी गायकी से श्रोताओं के बीच अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। उनकी आवाज में पहाड़ की सहजता, लोकजीवन की मिठास और मिट्टी से जुड़े भावों की झलक सुनाई देती है। यही वजह है कि ‘सरू कुमैण’ महज एक गीत नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक स्मृतियों को सुर देने वाली प्रस्तुति के रूप में श्रोताओं तक पहुंच रहा है।
गीत की खासियत यह है कि इसमें आधुनिकता की चमक के बीच लोक संस्कृति की वह खुशबू बरकरार दिखाई देती है, जो पहाड़ के संगीत की असली पहचान रही है। धुन आगे बढ़ती है तो लगता है जैसे पहाड़ी पगडंडियों से कोई पुराना किस्सा सुर बनकर लौट आया हो और शब्दों के बीच कहीं गांव, आंगन, रिश्ते और पहाड़ की अपनी बोली सांस ले रही हो।
‘सरू कुमैण’ की चर्चा अब पहाड़ की चौपालों से निकलकर सोशल मीडिया के मंच तक पहुंच चुकी है। यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर गीत को लेकर श्रोताओं की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। लोग गीत को सुनने के साथ इसे अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा भी कर रहे हैं।
जयदेव मिनान की गायकी को लेकर श्रोताओं की ओर से विशेष सराहना देखने को मिल रही है। संगीत प्रेमियों का मानना है कि उनकी आवाज में पहाड़ की लोक संवेदना को महसूस किया जा सकता है। यही जुड़ाव गीत को श्रोताओं के बीच अपनी जगह बनाने में मदद कर रहा है।
‘सरू कुमैण’ की लोकप्रियता इस बात का संकेत भी है कि पहाड़ी लोकसंगीत आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही गहराई से बसा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी ये गीत गांव की चौपालों और पहाड़ी आंगनों तक सीमित रहते थे, आज वही स्वर डिजिटल दुनिया के जरिए दूर-दराज तक पहुंच रहे हैं।
जयदेव मिनान की आवाज में सजा ‘सरू कुमैण’ इसी बदलते दौर में लोक और आधुनिक मंच के बीच एक खूबसूरत सेतु बनता दिखाई दे रहा है। गीत की बढ़ती चर्चा यह बताती है कि पहाड़ की संस्कृति को यदि अपनी मिट्टी की खुशबू और भावनाओं के साथ प्रस्तुत किया जाए तो श्रोता उसे सिर आंखों पर बिठाने में देर नहीं करते।
संगीत प्रेमियों से अपील है कि ‘सरू कुमैण’ को सुनें, अपनी प्रतिक्रिया साझा करें और जयदेव मिनान को मेंशन कर इस पहाड़ी सुर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं।









