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प्रकृति का अल्टीमेटम: राहत की फुहारों के बीच सुलगते सवाल: शिवानी गौर

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवानी गौर) हरिद्वार। महीनों की भीषण और प्राणघातक गर्मी के बाद आखिरकार मानसून ने दस्तक दे दी है। बादलों की गड़गड़ाहट और बारिश की बूंदों ने हर की पैड़ी से लेकर शहर की तंग गलियों तक, हर चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान बिखेर दी है। लोग खुश हैं, राहत की सांस ले रहे हैं। लेकिन इस राहत के बीच एक बड़ा और कड़वा सवाल हमारे सामने खड़ा है—क्या यह खुशकिस्मती हमेशा हमारे साथ रहेगी? या फिर यह सिर्फ एक छोटा सा विराम है उस तबाही के बीच, जिसे हम खुद अपने हाथों से लिख रहे हैं?

कौन है इस प्रचंड गर्मी का जिम्मेदार: प्रकृति या हमारा स्वार्थ?
जब पारा 45 डिग्री के पार जाता है, तो हम प्रकृति को कोसने लगते हैं। लेकिन अगर हम ईमानदारी से इस समस्या की जड़ में जाएं, तो कसूरवार प्रकृति नहीं, बल्कि हमारा असीमित स्वार्थ है। ईश्वर ने हमें यह धरती, यह नदियां, यह पहाड़ और यह मौसम एक वरदान के रूप में दिए थे ताकि हमारा जीवन सुगम और सरल बन सके। बदले में हमने क्या किया? हमने इस वरदान को अपनी सुख-सुविधाओं की मंडी बना दिया।

आज स्थिति यह है:
एक घर, चार लोग, चार गाड़ियां: सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करना अब हमारे स्टेटस सिंबल के खिलाफ माना जाता है। थोड़ी दूर भी जाना हो, तो हमें कार चाहिए।

अंधाधुंध दोहन: जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है और नदियों के सीने पर अवैध निर्माण हो रहे हैं।

हर कमरे में एसी: हम भूल चुके हैं कि जिस हवा को हम अंदर ठंडा कर रहे हैं, वो बाहर की दुनिया को और ज्यादा झुलसा रही है। हम प्रकृति के बैंक अकाउंट से सिर्फ ‘विड्रॉल’ (निकासी) कर रहे हैं, उसमें एक भी बूंद ‘डिपॉजिट’ (जमा) नहीं कर रहे। हम उसे लगातार खर्च कर रहे हैं, उसे बुरी तरह जख्मी कर रहे हैं।

अगर यही हाल रहा, तो क्या होगा हमारा भविष्य?
आज जो गर्मी हमें सिर्फ परेशान कर रही है, आने वाले समय में वह हमारी नस्लों को तबाह कर देगी। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इंसानी फितरत नहीं बदली, तो:

जल संकट: ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे, जिससे पहले बाढ़ और फिर भयंकर सूखा आएगा। आने वाले समय में गर्मी के ये सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे और इंसान का घरों से निकलना मुमकिन नहीं होगा।

अंधकारमय भविष्य: हम अपनी आने वाली पीढ़ियों, अपने बच्चों के लिए विरासत में धन-दौलत नहीं, बल्कि एक सुलगती हुई और बीमार धरती छोड़कर जाएंगे, जहां सांस लेना भी एक लग्जरी बन जाएगा।

जागने का वक्त यही है: क्या हैं हमारे कर्तव्य? हमारा वर्तमान हमें लगातार चेतावनी दे रहा है कि “अभी भी सुधर जाओ, वरना भविष्य बहुत अंधकारमय होगा।” हमें अपनी आदतों में बड़े बदलाव करने होंगे:

सहमति और सादगी: अगर घर में चार लोग हैं, तो अलग-अलग कमरों में चार एसी चलाने के बजाय, एक ही कमरे में साथ सोएं। इससे बिजली तो बचेगी ही, परिवार का आपसी प्यार भी बढ़ेगा।

आने वाली पीढ़ी के लिए पेड़ लगाएं: हमें सिर्फ अपने लिए नहीं, अपने बच्चों के भविष्य के लिए पौधे लगाने होंगे और उन्हें पेड़ों की तरह बड़ा करना होगा।

संसाधनों का सम्मान: पानी, बिजली और ईंधन का उतना ही इस्तेमाल करें जितनी जरूरत हो।

निष्कर्ष: आज हरिद्वार में मानसून की बारिश ने हमें जिंदा रहने की एक और मोहलत दी है। यह बारिश प्रकृति का आशीर्वाद भी है और एक चेतावनी भी। प्रकृति हमसे बदला नहीं लेती, वह बस अपना संतुलन बनाना जानती है। अगर हम नहीं संभले, तो प्रकृति खुद को तो बचा लेगी, लेकिन इंसान का अस्तित्व इस धरती से मिट जाएगा। आइए, आज इस सुहाने मौसम में सिर्फ आनंद न लें, बल्कि एक संकल्प भी लें—प्रकृति को उजाड़ेंगे नहीं, उसे संवारेंगे।

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