राम पथ गमन: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के चरणों की दिव्य यात्रा—आरंभ: श्वेता शर्मा
राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। भारतीय संस्कृति में भगवान श्री राम केवल एक पूजनीय देवता नहीं, बल्कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। वे भगवान विष्णु के अवतार होकर भी एक आदर्श मानव जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। एक पुत्र के रूप में आज्ञाकारिता, एक भाई के रूप में स्नेह और त्याग, एक पति के रूप में निष्ठा और एक राजा के रूप में प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व—इन सभी रूपों में श्री राम ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को पूर्णता के साथ जिया। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि आदर्श केवल कहे नहीं जाते, बल्कि जीए जाते हैं। अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेकर भी उनका जीवन राजसी सुखों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह दिखाया कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म, त्याग और मर्यादा से प्राप्त होती है। उनके जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं, जहाँ उन्होंने ऋषियों की रक्षा की, अहिल्या को पुनः सम्मान दिलाया और साधु-संतों को भयमुक्त किया। श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है—अर्थात वह पुरुष जो हर परिस्थिति में अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करे। पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर वनवास स्वीकार करना, विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखना और हर निर्णय में सत्य का साथ देना—ये सभी उनके व्यक्तित्व की महानता को दर्शाते हैं। इसी संदर्भ में “राम पथ गमन” का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक यात्रा है। जिन मार्गों से होकर श्री राम गुज़रे, वे केवल स्थान नहीं, बल्कि उनके जीवन के निर्णयों और आदर्शों के साक्षी हैं। जब हम उनके वनवास के मार्ग और संघर्षों को समझते हैं, तब यह केवल अतीत की कथा नहीं रह जाती, बल्कि हमारे अपने जीवन का दर्पण बन जाती है। कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, कर्तव्य को सर्वोपरि रखना और सत्य का साथ कभी न छोड़ना—ये शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। इसी उद्देश्य के साथ यह लेखमाला प्रारंभ की जा रही है, जिसमें श्री राम के वनवास के एक-एक पड़ाव को समझने का प्रयास किया गया है। यह यात्रा केवल उनके पदचिन्हों का अनुसरण करने की नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की एक विनम्र पहल है। इस पथ के अध्ययन में संतों के प्रयास भी महत्वपूर्ण रहे हैं। राधाकृष्णन भारती (शिरडी) एक समर्पित साधक और श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, जिन्होंने अपने जीवन को भक्ति और सेवा को समर्पित किया है। वर्ष 2016 में हरिद्वार में दीक्षा लेकर उन्होंने संन्यास मार्ग अपनाया और पूरे भारत में तीर्थ यात्राएँ करते हुए आध्यात्मिक जागरण का संदेश दिया। उनकी “राम पथ यात्रा” विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने भगवान श्रीराम के वनवास मार्ग का अनुसरण कर अनेक स्थलों का अनुभव किया। उनकी साधना, तप और समर्पण इस यात्रा को और अधिक प्रमाणिकता प्रदान करते हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम श्री राम का यह पथ केवल वनगमन का मार्ग नहीं, बल्कि भक्ति का जीवंत स्वरूप है। यही वह मार्ग है जहाँ शबरी की निष्कपट श्रद्धा को उन्होंने प्रेम से स्वीकार किया और जहाँ हर कदम पर धर्म, करुणा और कृपा का अनुभव होता है। उनके चरण जहाँ पड़े, वे स्थान तीर्थ बन गए। यह मेरे जीवन का एक अत्यंत गहन आध्यात्मिक अनुभव रहा।









