संवेदनहीनता: आधुनिक समाज की खामोश बीमारी: शिवानी गौर
शिवानी गौर—संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन मूल्यों पर लिखने वाली स्वतंत्र लेखिका
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(लेख) हरिद्वार। आज का समाज पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन विडंबना यह है कि दिलों के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। हम लोगों की बातें सुनते हैं, पर उनकी भावनाओं को समझने का समय नहीं निकालते। किसी के चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को पढ़ने की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। संवेदनहीनता कोई शोर मचाने वाली बीमारी नहीं है। यह चुपचाप हमारे व्यवहार, हमारे रिश्तों और हमारी सोच में घर कर जाती है। जब किसी के आँसू हमें विचलित नहीं करते, किसी की पीड़ा हमें छू नहीं पाती, और किसी की मदद करने से पहले हम अपने लाभ-हानि का हिसाब लगाने लगते हैं, तब यह बीमारी अपना असर दिखाने लगती है। हर इंसान चाहता है कि उसे सुना जाए, समझा जाए और उसके भावों का सम्मान किया जाए। लेकिन जब समाज में सहानुभूति की जगह आलोचना और समझ की जगह निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, तब रिश्ते कमजोर पड़ने लगते हैं और लोग भीतर ही भीतर अकेले होने लगते हैं। संवेदनशील होना कमजोरी नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत है। किसी के दर्द को महसूस कर पाना, बिना किसी स्वार्थ के उसका साथ देना और उसकी भावनाओं का सम्मान करना ही हमें एक बेहतर इंसान बनाता है। शायद समय आ गया है कि हम अपनी व्यस्तताओं से थोड़ा बाहर निकलें और फिर से इंसान को इंसान की तरह देखना सीखें। क्योंकि जब संवेदनाएं जीवित रहती हैं, तभी रिश्ते जीवित रहते हैं, और जब रिश्ते जीवित रहते हैं, तभी समाज स्वस्थ और मानवीय बनता है। सोशल मीडिया की नज़र में संवेदनशील होने की होड़ सी दिखाई देती है।किसी भी अपराध की वीडीओ आसानी से सुलभ है पर अपराधी की सजा निश्चित होने में दीर्घ काल लगता हैं। सारे रिश्ते मोबाइल और सोशल मीडिया के द्वारा ही निभाए जा रहे है।। कौन सही है और कौन गलत इसका निर्णय भी असंख्य सामाजिक स्तरों के आधार पर किया जाता है। शिक्षा का उद्देश्य तभी सार्थक होगा जब व्यक्तित्व में प्रेम, सम्मान तथा संवेदना के साथ मानवीय मूल्यों का संतुलन होगा।
शिवानी गौर—संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन मूल्यों पर लिखने वाली स्वतंत्र लेखिका









