विरोध का अधिकार या विरोध की मर्यादा?
लोकतंत्र में आवाज़ उठाना अधिकार है, लेकिन उस आवाज़ की गरिमा बनाए रखना कर्तव्य: शिवानी गौर

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवानी गौर) लेखिका। भारत का लोकतंत्र अपनी विविधता, असहमति और संवाद की संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ नागरिकों को न केवल अपनी बात कहने का अधिकार है, बल्कि सरकार से जवाब माँगने का भी अधिकार प्राप्त है। जब किसी ऐसी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग जाए, जिस पर लाखों युवाओं का भविष्य निर्भर करता हो, तब विरोध केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि लोकतंत्र का एक आवश्यक अंग बन जाता है। हाल के वर्षों में नीट परीक्षा को लेकर उठे विवाद और उसके बाद जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के मन में यह प्रश्न था कि यदि परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो जाए, तो वर्षों की मेहनत और सपनों का मूल्य कौन लौटाएगा? यह पीड़ा वास्तविक थी, और इस पीड़ा की अभिव्यक्ति भी स्वाभाविक थी।
यही कारण है कि छात्रों द्वारा न्याय और पारदर्शिता की माँग को लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता। यदि शिक्षा व्यवस्था में कहीं गंभीर चूक हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होना और दोषियों पर कार्रवाई होना अनिवार्य है। शिक्षा मंत्रालय और उससे जुड़े सभी जिम्मेदार पदों से जनता जवाबदेही की अपेक्षा करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पद केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि उत्तरदायित्व भी सौंपता है। इसलिए यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियों में नैतिक जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा। किन्तु इसी बिंदु पर एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। क्या किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके उद्देश्य से तय होती है, या उसके तरीकों से भी? यदि किसी प्रदर्शन में अभद्र भाषा का प्रयोग हो, सार्वजनिक स्थानों पर अशोभनीय व्यवहार किया जाए, व्यक्तिगत मर्यादाओं का उल्लंघन हो या विरोध का स्वर आक्रामकता में बदल जाए, तो क्या वह आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो नहीं देता? इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत के सबसे प्रभावशाली आंदोलनों ने अपनी शक्ति हिंसा या अभद्रता से नहीं, बल्कि अनुशासन और नैतिक बल से प्राप्त की। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य जैसी विशाल शक्ति को चुनौती दी, लेकिन उनके आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उनका संयम, सत्य और अहिंसा थी। इसलिए यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि क्या हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग उसी गरिमा के साथ कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा संविधान हमसे करता है? यदि किसी आंदोलन में कुछ लोग अपनी भाषा, व्यवहार या पहनावे से उसका स्वरूप बदलने का प्रयास करते हैं, तो यह भी आवश्यक है कि उनकी भूमिका की निष्पक्ष जाँच हो। साथ ही, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्यों और प्रमाणों का सम्मान किया जाना चाहिए। बिना पर्याप्त प्रमाण किसी पूरे समूह, संगठन या समुदाय को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। लोकतंत्र भावनाओं से नहीं, तथ्यों से चलता है। यह भी विचारणीय है कि आज का युवा केवल अपने अधिकारों का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का निर्माता भी है। कल यही छात्र डॉक्टर बनेंगे, शिक्षक बनेंगे, न्यायाधीश, वैज्ञानिक और प्रशासक बनेंगे। यदि संघर्ष की भाषा में संयम समाप्त हो जाएगा, तो समाज में संवाद की संस्कृति भी कमजोर पड़ जाएगी। विरोध जितना प्रखर हो, उतना ही सभ्य भी होना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर में आंदोलनों का स्वरूप भी बदल गया है। कई बार वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और कैमरों के सामने दिखाई देने वाली उग्रता चर्चा का केंद्र बन जाती है। इससे सबसे अधिक नुकसान उसी उद्देश्य का होता है जिसके लिए आंदोलन शुरू किया गया था। जनता का ध्यान समस्या से हटकर प्रदर्शन की शैली पर केंद्रित हो जाता है। इस्ती़फा मांग लेना इस बात का प्रमाण भी होना चाहिए के आगे इन सब चीजों की पुनरावृत्ति नहीं होगी। आज आवश्यकता केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं है। आवश्यकता इस बात की भी है कि सरकार समय पर उत्तर दे, संस्थाएँ पारदर्शी बनें, और युवाओं को यह विश्वास मिले कि उनकी मेहनत सुरक्षित है। दूसरी ओर, युवाओं की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने अधिकारों की लड़ाई संविधान, शालीनता और नैतिक मर्यादाओं के भीतर रहकर लड़ें। किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत यह नहीं होती कि वहाँ विरोध होता है या नहीं, उसकी ताकत इस बात में होती है कि वहाँ विरोध कितनी गरिमा, तर्क और जिम्मेदारी के साथ किया जाता है। यदि सरकार जवाबदेह होगी और नागरिक मर्यादित रहेंगे, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा। आज देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो अन्याय के सामने झुकें नहीं, लेकिन अपने संस्कारों और शिष्टाचार को भी कभी न छोड़ें। क्योंकि इतिहास केवल यह याद नहीं रखता कि किसने विरोध किया था, इतिहास यह भी याद रखता है कि विरोध किस प्रकार किया गया था।









