जय माता दी शारदीय नवरात्र के शुभ अवसर पर विशेष: श्वेता शर्मा
माँ शैलपुत्री की आराधना: मूलाधार चक्र जागरण और प्रथम दिन का महत्व
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। नवरात्रि का पावन पर्व जगज्जननी भगवती जगदम्बा की भक्ति और उपासना का अनुपम उत्सव है। नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप में माँ शैलपुत्री की पूजा-अर्चना का विधान है। नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना के साथ भक्त माँ शैलपुत्री के चरणों में अपना शीश नवाते हैं। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, पूर्व जन्म में देवी का अवतार दक्ष प्रजापति की पुत्री के रूप में हुआ था, तब उनका नाम ‘सती’ था। सती का विवाह देवाधिदेव भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया, किन्तु उसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। जब देवी सती को इस बात का भान हुआ, तो वे बिना बुलाए पिता के घर पहुँच गईं। वहाँ उन्होंने देखा कि उनके पिता दक्ष भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कह रहे हैं। अपने स्वामी महादेव का यह अपमान देवी सती सहन न कर सकीं और उन्होंने उसी क्षण यज्ञ-कुण्ड की पवित्र योगाग्नि में स्वयं को आहुत कर अपनी देह का त्याग कर दिया। जब सती का अगला जन्म हुआ, तब उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। हिमालय अर्थात शैल की पुत्री होने के कारण ही उनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। पुनर्जन्म में भी उन्होंने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में प्राप्त किया। माँ शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत भव्य, शांत और ममतामयी है। देवी माँ का वाहन वृषभ अर्थात बैल है, इसीलिए इन्हें ‘वृषारूढ़ा’ भी कहा जाता है। माँ शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है, तथा उनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है। माँ अपने भक्तों पर असीम कृपा और ममता की वर्षा करती हैं तथा उनके समस्त कष्टों को हर लेती हैं। धार्मिक मान्यताओं और तंत्र-शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन साधक का ध्यान मूलाधार चक्र में स्थित होता है। प्रथम दिन की पूजा से साधक का मूलाधार चक्र सिद्ध होता है और उसकी भक्ति का आधार मजबूत होता है। प्राचीन काल में महर्षि मार्कंडेय, महर्षि वशिष्ठ और अनेक तपस्वियों ने पर्वतराज हिमालय की तपोभूमि केदारखंड क्षेत्र में माँ शैलपुत्री की अखंड आराधना की थी। ऋषियों की इस निष्काम तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें सर्वसिद्धि का वरदान दिया था। माँ शैलपुत्री का सबसे प्राचीन और अति-सिद्ध मंदिर काशी के अलईपुर क्षेत्र में स्थित है। पौराणिक मान्यता है कि नवरात्रि के पहले दिन जो भी भक्त काशी स्थित माँ शैलपुत्री मंदिर में दर्शन-पूजन करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ माँ शैलपुत्री को गाय का शुद्ध देशी घी अर्पित किया जाता है, जो देवी को अत्यंत प्रिय है। माँ की कृपा और मनवांछित फल पाने के लिए भक्त देवी के इस ध्यान-मंत्र का जप करते हैं। जो मनवांछित फल प्रदान करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो वृषभ (बैल) पर सवार हैं, अपने हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं और जो अत्यंत यशस्विनी हैं, उन माँ शैलपुत्री की मैं वंदना करता हूँ। जो भक्त नवरात्रि के प्रथम दिन विधि-विधान से पूजन कर माँ शैलपुत्री की कथा सुनते हैं, मंत्र का अर्थ सहित ध्यान करते हैं और उनकी आरती उतारते हैं, माँ उनके घर में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।









