स्मार्ट मीटर के विवाद पर अरविंद कुमार श्रीवास्तव ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को भेजा ज्ञापन
गगन शर्मा सह सम्पादक

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। हरिद्वार के वरिष्ठ अधिवक्ता और विख्यात लेखक डॉ० अरविंद कुमार श्रीवास्तव ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को स्मार्ट मीटर के विवाद को देखते हुए विवाद के निदान को लेकर ज्ञापन भेजा है। ज्ञापन में अधिवक्ता डॉ. श्रीवास्तव ने लिखा है कि उत्तराखण्ड में स्मार्ट मीटर लगाए जाने की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में विद्युत उपभोक्ताओं द्वारा विभिन्न प्रकार की शिकायतें, आशंकाएँ एवं आपत्तियाँ व्यक्त की जा रही हैं। अनेक स्थानों पर स्मार्ट मीटरों को लेकर यूपीसीएल के अधिकारियों/कर्मचारियों एवं आम नागरिकों के मध्य विवाद, तनाव एवं टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। यह स्थिति जनहित, लोक-शांति तथा प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। स्मार्ट मीटर योजना का उद्देश्य विद्युत वितरण प्रणाली को आधुनिक एवं पारदर्शी बनाना बताया जा रहा है, किंतु इसके क्रियान्वयन को लेकर अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं, जिनका स्पष्ट उत्तर जनता को दिया जाना आवश्यक है, जैसे कि जब पूर्व में स्थापित डिजिटल मीटर कार्यशील एवं उपयोग योग्य हैं, तो उन्हें समयपूर्व हटाकर स्मार्ट मीटर लगाने की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई?, डिजिटल मीटरों की स्थापना पर पूर्व में कितना सार्वजनिक धन अथवा उपभोक्ताओं का धन व्यय किया गया था? क्या डिजिटल मीटरों की निर्धारित उपयोगी आयु पूर्ण हो चुकी है? यदि नहीं, तो उनकी शेष उपयोगी अवधि एवं अवशिष्ट आर्थिक मूल्य कितना है? स्मार्ट मीटर योजना की कुल लागत कितनी है तथा उसका वित्तीय भार किस पर डाला जा रहा है—राज्य सरकार, करदाताओं, विद्युत उपभोक्ताओं अथवा अन्य किसी संस्था पर? यदि डिजिटल मीटरों को हटाया जा रहा है, तो उन पर किए गए पूर्व निवेश का समायोजन किस प्रकार किया जाएगा? क्या डिजिटल मीटर निर्माण करने वाली कंपनियों से किसी प्रकार की कीमत, अवशिष्ट मूल्य अथवा उत्तरदायित्व निर्धारित किया गया है? यदि नहीं, तो उसके कारण सार्वजनिक किए जाएँ। हटाए गए डिजिटल मीटरों का क्या होगा? उनका पुनः उपयोग, नीलामी अथवा स्क्रैप के रूप में निस्तारण किस प्रक्रिया से किया जाएगा तथा उससे प्राप्त धनराशि का उपयोग कैसे होगा? क्या स्मार्ट मीटर योजना के संबंध में कोई स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराया गया है? यदि हाँ, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। स्मार्ट मीटरों के कारण बढ़े हुए बिलों, तकनीकी त्रुटियों तथा उपभोक्ता शिकायतों की जांच हेतु स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए। क्या यह सुनिश्चित किया गया है कि उपभोक्ताओं पर पुराने डिजिटल मीटरों एवं नए स्मार्ट मीटरों दोनों की लागत का दोहरा वित्तीय भार न पड़े? एडवोकेट श्रीवास्तव ने अपने ज्ञापन में लिखा है कि स्मार्ट मीटर योजना को लेकर उत्पन्न शंकाओं, शिकायतों एवं असंतोष के कारण यूपीसीएल कर्मचारियों और नागरिकों के बीच प्रत्यक्ष विवाद की घटनाएँ सामने आ रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में केवल प्रशासनिक निर्देश पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र समीक्षा, जन-सुनवाई तथा प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना आवश्यक है। यदि समय रहते उचित हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह विवाद व्यापक जन-असंतोष का रूप ले सकता है।
अंत में उन्होंने मांग की है कि स्मार्ट मीटर योजना पर स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच समिति गठित की जाए। जिस से योजना से संबंधित सभी वित्तीय एवं तकनीकी विवरण सार्वजनिक किए जाएँ। प्रत्येक जनपद में जन-सुनवाई आयोजित कर उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनी जाएँ।
विवादित बिलों एवं शिकायतों के निस्तारण हेतु विशेष तंत्र स्थापित किया जाए। उपभोक्ताओं पर किसी प्रकार का अनुचित अथवा दोहरा वित्तीय भार न डाला जाए। यूपीसीएल कर्मचारियों एवं नागरिकों के मध्य उत्पन्न विवादों को रोकने हेतु आवश्यक प्रशासनिक एवं नीतिगत हस्तक्षेप किया जाना, जनहित में कई प्रश्न का उत्तर मांगते हुए निष्पक्ष जांच एवं आवश्यक कार्यवाही करने की उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से मांग की है।









