हरिद्वार

उत्तराखंड में अवैध खनन, पहाड़ों की छाती पर बढ़ता संकट

फिरोज अहमद समाचार सम्पादक

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(फिरोज अहमद) हरिद्वार। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की नदियां, जंगल और पहाड़ केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन का आधार भी हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से अवैध खनन का कारोबार बढ़ा है, उसने राज्य की पर्यावरणीय व्यवस्था के साथ-साथ प्रशासनिक दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हरिद्वार, उधमसिंह नगर, देहरादून और नैनीताल जैसे जिलों में रात के अंधेरे से लेकर दिन के उजाले तक नदियों का सीना चीरकर खनिज निकाले जा रहे हैं सरकार समय-समय पर अवैध खनन रोकने के बड़े दावे करती है, अभियान चलाए जाते हैं, वाहनों को सीज किया जाता है और अधिकारियों की बैठकें भी होती हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि अवैध खनन का नेटवर्क लगातार मजबूत होता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर प्रशासनिक सख्ती के दावों के बावजूद यह कारोबार कैसे फल-फूल रहा है दरअसल, अवैध खनन केवल मिट्टी, रेत और पत्थर निकालने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित आर्थिक तंत्र बन चुका है। इसमें स्थानीय स्तर से लेकर बड़े नेटवर्क तक की भूमिका की चर्चाएं आम हैं। यही कारण है कि कई बार कार्रवाई केवल छोटे वाहन चालकों या मजदूरों तक सीमित रह जाती है, जबकि असली सरगना कानून की पकड़ से दूर दिखाई देते हैं। इस अवैध दोहन का सबसे बड़ा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। नदियों की धारा बदल रही है,भूजल स्तर प्रभावित हो रहा है और बरसात के मौसम में कटाव और बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में अंधाधुंध खनन से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। चिंता की बात यह भी है कि कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का जीवन सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है। भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कें टूट रही हैं राहगीरों की जाने जा रही है, धूल और प्रदूषण बढ़ रहा है और खेती-किसानी पर भी असर पड़ रहा है। कई जगह ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया। अब जरूरत केवल छापेमारी या औपचारिक कार्रवाई की नहीं, बल्कि मजबूत और पारदर्शी नीति की है। खनन क्षेत्रों की लगातार निगरानी, तकनीक आधारित ट्रैकिंग, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी फाइलों तक सीमित रखने के बजाय जमीनी प्राथमिकता बनाना होगा। उत्तराखंड की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय संतुलन से है। यदि यही खतरे में पड़ गया, तो विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे सरकार, प्रशासन और समाज तीनों को मिलकर यह समझना होगा कि अवैध खनन से होने वाला तात्कालिक लाभ भविष्य की बड़ी तबाही का कारण बन सकता है। अब समय आ गया है कि देवभूमि की नदियों और पहाड़ों को बचाने के लिए कठोर और ईमानदार कदम उठाए जाएं।

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