देहरादून

भारत की बदलती डेमोग्राफी और स्वस्थ बुढ़ापा, विज्ञान और योग का संगम: डॉ. शिवओम आचार्य

राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। भारत, जिसे कभी युवाओं का देश कहा जाता था, अब एक महत्वपूर्ण डेमोग्राफिक बदलाव (जनसांख्यिकीय परिवर्तन) के मुहाने पर खड़ा है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ औसत आयु बढ़ी है, और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, 2050 तक भारत की बुजुर्ग आबादी दोगुनी से अधिक होने का अनुमान है। यह बदलाव एक बड़ी चुनौती लेकर आया है: ‘एजिंग विदाउट इलनेस’ यानी बीमारियों के बिना बुढ़ापा।

इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम, “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग,” केवल एक नारा नहीं है, अपितु एक वैज्ञानिक आवश्यकता है, जिसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वृद्धावस्था की प्रक्रिया को धीमा करने और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने में योग की भूमिका अब पारंपरिक दावों से आगे बढ़कर कठोर वैज्ञानिक शोधों द्वारा प्रमाणित हो चुकी है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है ‘सेलुलर एजिंग’ (कोशिकीय बुढ़ापा) पर प्रभाव। एजिंग मूल रूप से क्रोनिक लो-ग्रेड सूजन (जिसे ‘इंफ्लेमेजिंग’ कहा जाता है) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का परिणाम है। एम्स सहित दुनिया भर के प्रमुख संस्थानों के अध्ययनों ने साबित किया है कि नियमित योगाभ्यास और प्राणायाम शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करते हैं और प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स को नियंत्रित करते हैं, जिससे कोशिकीय स्तर पर होने वाली क्षति धीमी हो जाती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवधारणा ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ है। बढ़ती उम्र के साथ मस्तिष्क के कुछ हिस्सों, विशेष रूप से हिप्पोकैम्पस, का सिकुड़ना सामान्य है, जो याददाश्त और संज्ञानात्मक कार्यों (Cognitive functions) को प्रभावित करता है। हालांकि, शोध बताते हैं कि ध्यान (Meditation) और सचेतन योगाभ्यास (Mindful Yoga) मस्तिष्क के ग्रे-मेटर के घनत्व को बनाए रखने और तंत्रिका पथों (Neural Pathways) को पुनर्गठित करने में मदद करते हैं। यह अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को कम करने में एक प्रभावी, गैर-औषधीय हस्तक्षेप है, जो भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ ऐसी बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है।

शारीरिक स्वास्थ्य के स्तर पर, भारत में बुजुर्गों के बीच गतिशीलता की कमी और गिरने (Falls) का डर एक प्रमुख मुद्दा है, जो अक्सर फ्रैक्चर और निर्भरता का कारण बनता है। हठयोग के सरल आसन, विशेष रूप से वे जो संतुलन और कोर स्ट्रेंथ (जैसे वृक्षासन या ताड़ासन के रूपांतरण) पर केंद्रित हैं, ‘प्रोप्रियोसेप्शन’ (शरीर की स्थिति का बोध) और मस्कुलोस्केलेटल स्वास्थ्य (हड्डियों और मांसपेशियों का स्वास्थ्य) में उल्लेखनीय सुधार करते हैं। यह बायोमैकेनिकल लाभ बुजुर्गों के आत्मविश्वास और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा, भारतीय जनसंख्या में हृदय रोगों और टाइप-2 मधुमेह की उच्च व्यापकता को देखते हुए, योग का महत्व और बढ़ जाता है। प्राणायाम ‘वेगस नर्व’ को उत्तेजित करता है, जो पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करता है। यह वैज्ञानिक रूप से हृदय गति परिवर्तनशीलता (Heart Rate Variability – HRV) में सुधार करने के लिए जाना जाता है।

संक्षेप में, ‘स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग’ केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह समग्र स्वास्थ्य के लिए एक साक्ष्य-आधारित, बहुआयामी दृष्टिकोण है। जब हम 12वाँ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- २०२६ मना रहे हैं तो फोकस, योग को एक वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में अपनाने पर होना चाहिए जो न केवल जीवन में वर्ष जोड़ता है, बल्कि वर्षों में जीवन भी जोड़ता है, जिससे भारत की बुजुर्ग आबादी एक स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जी सके।

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