देहरादून

नवरात्रि के शुभ अवसर पर विशेष: पंचमं दिन-मां स्कंदमाता की कथा व महात्म्य: श्वेता शर्मा

राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) हरिद्वार। नवरात्रि का पांचवां दिन जगज्जननी भगवती के पांचवें स्वरूप माँ स्कंदमाता की भक्ति और साधना को समर्पित है। कार्तिकेय (स्कंद) जी की माता होने के कारण देवी के इस पावन स्वरूप को ‘स्कंदमाता’ कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब तारकासुर नामक दैत्य का अत्याचार तीनों लोकों में पराकाष्ठा पर पहुँच गया और उसने देवताओं को स्वर्गाधिपत्य से निष्कासित कर दिया, तब समस्त देवता ब्रह्मा जी के साथ महाकाल शिव और भगवती पार्वती की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार तारकासुर का वध केवल शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा ही संभव था। तत्पश्चात भगवती पार्वती के तेज से कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ। जब भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय देवासुर संग्राम में देवसेनापति बने, तब भगवती ने स्वयं अपनी गोद में बालक स्कंद को धारण कर युद्धभूमि में उनका मार्गदर्शन और रक्षण किया। स्कंदमाता के इसी वात्सल्यमयी रूप की अनुकंपा से भगवान स्कंद ने तारकासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया और धर्म की पुनः स्थापना की। मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शुभ्र, दिव्य और स्नेहमयी है। माँ कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसी कारण इन्हें ‘कमलासना देवी’ भी कहा जाता है। देवी चार भुजाओं वाली हैं, जिनके ऊपरी दो हाथों में कमल-पुष्प सुशोभित हैं, एक हाथ से अपनी गोद में बैठे बाल रूप स्कंद (कार्तिकेय) को संभाले हुए हैं तथा चौथा हाथ साधकों को अभय प्रदान करने वाली वरदमुद्रा में है। माँ का वाहन सिंह है। तंत्र-शास्त्र और योग साधना के अनुसार, पंचम नवरात्र के दिन साधक का ध्यान विशुद्ध चक्र (Vishuddha Chakra) में स्थित होता है। विशुद्ध चक्र कंठ में स्थित होता है; माँ स्कंदमाता की साधना से साधक का यह चक्र जाग्रत होता है, जिससे उसकी वाणी में अलौकिक मधुरता, वाक्-सिद्धि, ज्ञान और एकाग्रता का संचार होता है। पौराणिक मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने माँ स्कंदमाता (सरस्वती स्वरूपा) की कठोर साधना करके ही अनुपम ज्ञान और विद्वता प्राप्त की थी।
माँ स्कंदमाता के सिद्धपीठ देश के विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों में स्थित हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू स्थित स्कंदमाता मंदिर (अन्नी अंचल) अत्यंत प्राचीन माना जाता है, जहाँ ऋषि-मुनि वात्सल्य भाव की साधना करते आए हैं। दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिलनाडु और केरला में जहाँ कार्तिकेय जी को ‘मुरुगन स्वामी’ के रूप में पूजा जाता है, वहाँ माँ स्कंदमाता को ‘मुरुगन ताई’ (मुरुगन की माता) के रूप में पूजने की प्राचीन परंपरा है। इसके अतिरिक्त, उत्तर भारत के गढ़वाल हिमालय में कोटेश्वर शक्तिपीठ के समीप भी देवी के इस वात्सल्य स्वरूप का प्राचीन पूजन स्थल विद्यमान है। पंचम नवरात्र के दिन साधक को प्रातः स्नान के पश्चात शुभ्र (सफेद) या पीले वस्त्र धारण कर देवी का पूजन करना चाहिए। माँ स्कंदमाता को पीले पुष्प, अलसी (उमा), केसर और केले का भोग अर्पित करने का विशेष विधान है। माँ को केले का भोग लगाने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य और परम शांति की प्राप्ति होती है। देवी की असीम अनुकंपा प्राप्त करने के लिए साधक इस ध्यान-मंत्र का जप करते हैं अर्थ: जो नित्य सिंह के सिंहासन पर विराजमान रहती हैं, जिनके दोनों हाथों में कमल के फूल सुशोभित हैं, वे यशस्विनी देवी स्कंदमाता मेरे लिए सदा शुभदात्री और कल्याणकारिणी हों। जो भक्त पंचम नवरात्र को निष्काम भाव से माँ स्कंदमाता की कथा सुनते हैं, ध्यान-मंत्र का जप करते हैं और उनकी आरती उतारते हैं, देवी उनके जीवन से अज्ञान व संताप मिटाकर उन्हें पुत्र-पौत्र, सुख-समृद्धि, अलौकिक ज्ञान और मोक्ष का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

Related Articles

Back to top button