जमीनों की रजिस्ट्रीयों का बड़ा खेल: करोड़ों के कथित फर्जीवाड़े की परतों के पीछे कौन
ग्राम समाज की भूमि पर आलीशान दफ्तर और गोदाम, कागजों में जमीन खाली: चर्चा

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। सलेमपुर और दादूपुर गोविंदपुर क्षेत्र में जमीनों की खरीद-फरोख्त और रजिस्ट्रीयों को लेकर गंभीर चर्चाएं आसमान छू रही हैं। स्थानीय स्तर पर करोड़ों रुपये के कथित जमीन घोटाले और फर्जी दस्तावेजों के सहारे भूमि का स्वामित्व हासिल करने की चर्चाएं हैं। मामला केवल जमीनों की रजिस्ट्रीयों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्राम समाज की भूमि के कथित इस्तेमाल को लेकर भी चर्चाएं उठ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन जमीनों को सरकारी अभिलेखों में खाली दर्शाया गया है, वहीं धरातल पर आलीशान दफ्तर और बड़े-बड़े गोदाम बने होने की चर्चाएं सामने आ रही है। सवाल यह है कि आखिर इन निर्माणों की अनुमति किसने दी। यदि भूमि ग्राम समाज की है तो उस पर निजी दफ्तर और गोदाम किस अधिकार से संचालित हो रहा हैं क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखी की जा रही है। चर्चा यह भी है कि गोदामों को कई वर्षों से किराये पर देकर मोटी रकम वसूली जा रही है। यदि यह चर्चाएं सही है तो सरकारी भूमि के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल से होने वाली कमाई किसके पास जा रही है और ग्राम पंचायत तथा प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है। इस पूरे मामले में एक ऐसा नाम चर्चाओं में बताया जा रहा है, जिसके पुराने और वर्तमान रहन-सहन को लेकर स्थानीय लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म हैं। कभी दूसरों के दफ्तरों में छोटे-मोटे काम करने वाला व्यक्ति आज बड़ी-बड़ी गाड़ियों और शानो-शौकत के साथ दिखाई देता है। आखिर इतनी तेजी से आर्थिक हैसियत में बदलाव कैसे आया है। क्या इसकी संपत्तियों और जमीनों की खरीद-फरोख्त की निष्पक्ष जांच हुई है। अब चर्चा है कि कथित अनियमितताओं पर पर्दा डालने के लिए उक्त व्यक्ति स्थानीय जनप्रतिनिधि बने के मुंगेरी लाल के सपने देख रहा है। जबकि वह व्यक्ति क्षेत्र में भू-माफिया के नाम से खुब शुमार है। जनता सब समझती है और देख भी रही है। लेकिन सवाल यह है कि जो स्थानीय जनप्रतिनिधि की भूमिका होती है क्या चर्चाओं के अनुसार वह इन जमीनों के दस्तावेजों तथा वास्तविक स्थिति की जांच कराने के लिए आगे क्यों नहीं आएं है। जिनकी रजिस्ट्री, स्वामित्व और वास्तविक कब्जे की जांच जरूरी है। राजस्व विभाग, तहसील प्रशासन, ग्राम पंचायत और संबंधित अधिकारियों को पुराने रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी, रजिस्ट्री दस्तावेजों और मौके की स्थिति का मिलान करना चाहिए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरे खेल के पीछे कौन-कौन शामिल हैं। ग्राम समाज की जमीन पर बने दफ्तर और गोदामों का असली मालिक कौन है। ग्राम पंचायत या उक्त व्यक्ति। और वर्षों से किराये की कमाई किसके खाते में जा रही है। और जल्द ही दस्तावेजों, जमीनों के विवरण और संबंधित तथ्यों के साथ इस पूरे मामले की परतें सामने लाने का प्रयास किया जाएगा। फिलहाल क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन असली तस्वीर सरकारी रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच सामने आने के बाद ही साफ होगी। जमीन सरकारी है या निजी, रजिस्ट्री असली है या संदिग्ध और जिम्मेदार कौन है इन सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना होगा।









