देहरादून

नवरात्रि: शक्ति, श्रद्धा और आत्मिक शुद्धि का महापर्व

राजेश पसरीचा उत्तराखंड प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) हरिद्वार। सृष्टि का आरंभ मां भगवती की इच्छा से हुआ, जिनके आदेश से सब कुछ प्रकट हुआ। संपूर्ण ब्रह्मांड में एकमात्र वही शक्ति रूप में विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उनकी उपासना करते हैं। इंद्र, यम, वरुण—समस्त देवता उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। वही मां भगवती नवरात्रि में अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर सहज ही उनके जीवन में पधारती हैं और उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। भक्त भी मां को प्रसन्न करने का हर संभव प्रयास करते हैं। नवरात्रि में मां आदिशक्ति की स्थापना अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से की जाती है। कलश स्थापना की जाती है, जिसे मां के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। दीप प्रज्वलित कर संपूर्ण नवरात्रि भक्त भक्ति-भाव से मां का भजन-कीर्तन करते हैं। नवरात्रि के नौ दिन मां आदिशक्ति के नौ स्वरूपों को समर्पित होते हैं। पहले दिन शैलपुत्री की पूजा होती है, जो शक्ति और धैर्य का प्रतीक हैं। दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाता है, जो ज्ञान और संयम प्रदान करती हैं। तीसरे दिन चंद्रघंटा माता का पूजन साहस और भयमुक्ति का संचार करता है। चौथे दिन कूष्मांडा माता की भक्ति से जीवन में ऊर्जा और आनंद आता है। पांचवें दिन स्कंदमाता के स्मरण से संतुलन और मातृ कृपा प्राप्त होती है। छठे दिन कात्यायनी माता की उपासना से बुरी शक्तियों से रक्षा और पराक्रम मिलता है। सातवें दिन कालरात्रि माता का ध्यान हमारे भीतर की नकारात्मकता का नाश करता है। आठवें दिन महागौरी माता की भक्ति से शांति, सौंदर्य और आध्यात्मिक उन्नति होती है। नवें दिन सिद्धिदात्री माता की उपासना से सभी सिद्धियां और सफलता प्राप्त होती हैं। इन दिनों मां को विभिन्न प्रकार के भोग—जैसे हलवा, पूरी, चना, मिठाइयां आदि—अर्पित किए जाते हैं। भक्त मां के मंत्रों का जाप करते हुए उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन मां की प्रसन्नता के लिए हवन किया जाता है तथा कन्याओं का पूजन कर उन्हें नाना प्रकार के उपहार देकर सम्मानित किया जाता है। कन्याओं का पूजन करने से मां की शक्ति स्थायी रूप से प्रकट होती है और पूरे वर्ष घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। सच्ची भक्ति ही भक्त के जीवन के समस्त अंधकार को दूर कर देती है। ऐसा भक्त न केवल मानसिक और आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और प्रसन्न रहता है, बल्कि सात्विक भोजन और सकारात्मक जीवनशैली के कारण शारीरिक रूप से भी स्वस्थ रहता है। यदि वह इसी प्रकार सात्विकता के साथ जीवन व्यतीत करे, तो उसके जीवन की समस्त नकारात्मकता का नाश हो जाता है।
जब भक्त निष्ठा और श्रद्धा से मां की उपासना करता है, तब उसके जीवन के अंधकार दूर होते हैं और वह शांति, संतुलन और सकारात्मकता का अनुभव करता है।

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