नवरात्रि के शुभ अवसर पर विशेष, माँ ब्रह्मचारिणी की महिमा: श्वेता शर्मा
राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। नवरात्रि का द्वितीय दिन भगवती दुर्गा के ‘ब्रह्मचारिणी’ स्वरूप की उपासना और आराधना को समर्पित है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ है तपस्या और ‘चारिणी’ का अर्थ है आचरण करने वाली—अर्थात तप का आचरण करने वाली देवी। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में जब देवी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था, तब नारद जी के उपदेश से उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन और घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण ही देवी का नाम ‘ब्रह्मचारिणी’ पड़ा। उन्होंने एक हजार वर्ष तक केवल फल-फूल खाकर व्यतीत किए और सौ वर्षों तक केवल शाक (सब्जियों) पर निर्वाह किया। तत्पश्चात कई हजार वर्षों तक देवी निर्जल और निराहार रहकर कठिन तपस्या में लीन रहीं। यहाँ तक कि उन्होंने वृक्षों से टूटे सूखे बेलपत्र भी खाना छोड़ दिया था, जिस कारण उनका एक नाम ‘अपर्णा’ भी पड़ा। देवी की ऐसी अलौकिक और कठोर तपस्या से तीनों लोक कांप उठे और अंततः ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर देवी को मनोवांछित वरदान दिया कि देवाधिदेव भगवान शिव ही उन्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत दिव्य, ज्योतिर्मय और शांत है। देवी माँ के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडल सुशोभित है। माँ ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को अनंत फल देने वाली और उनमें तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार तथा संयम की वृद्धि करने वाली हैं। धार्मिक मान्यताओं और तंत्र-शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन साधक का ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है। द्वितीय दिन की पूजा से साधक का स्वाधिष्ठान चक्र जागृत होता है और उसके भीतर धैर्य, सहनशीलता व आंतरिक बल का संचार होता है। प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र और अनेक साधकों ने देवी ब्रह्मचारिणी की घोर तपस्या करके दिव्य योग सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। माँ ब्रह्मचारिणी का प्रधान और प्राचीन सिद्ध मंदिर काशी (वाराणसी) के गंगा तट स्थित बालाजी घाट (ब्रह्मचारिणी घाट) पर विराजमान है। पौराणिक मान्यता है कि नवरात्रि के दूसरे दिन काशी स्थित माँ ब्रह्मचारिणी के दर्शन करने से साधक के जीवन के समस्त संकट दूर हो जाते हैं और उसे हर कार्य में विजय प्राप्त होती है। नवरात्रि के द्वितीय दिन माँ ब्रह्मचारिणी को शक्कर (चीनी) और पंचामृत का भोग लगाया जाता है, जिससे देवी प्रसन्न होकर साधक को आरोग्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देती हैं। माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त देवी के इस ध्यान-मंत्र का जप करते हैं। अर्थ: अपने कमल समान हाथों में माला और कमंडल धारण करने वाली, सर्वोत्कृष्ट माँ ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों। जो भक्त नवरात्रि के द्वितीय दिन विधि-विधान से पूजन कर माँ ब्रह्मचारिणी की कथा सुनते हैं, मंत्र का अर्थ सहित ध्यान करते हैं और उनकी आरती उतारते हैं, माँ उनके जीवन में सुख, शांति, संयम और अखंड सफलता का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।









