लालढांग कटावढ़ वन चौकी पर एंट्री का खेल, ओवरलोड खनन वाहनों और वनकर्मियों की भूमिका पर उठे सवाल: चर्चा
मोहम्मद आरिफ उत्तराखंड क्राइम प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। लालढांग क्षेत्र में स्थित चिड़ियापुर रेंज की कटावढ़ वन चौकी इन दिनों क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा खूब आग की लपटों की तरह उठ रही हैं कि वन चौकी से होकर गुजरने वाले खनन सामग्री से भरे ओवरलोड डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की वास्तविक संख्या और अभिलेखों में दर्ज संख्या में कहीं न कहीं बड़ा अंतर तो नहीं है। क्षेत्रीय चर्चा के अनुसार दो खनन पट्टों से निकलने वाले वाहन वन क्षेत्र से होकर कटावढ़ वन चौकी के सामने से लालढांग और गैंड़ीखाता मार्ग के जरिए उत्तर प्रदेश की ओर जा रहे हैं। और वन चौकी पर तैनात कर्मचारी गुजरने वाले वाहनों की एंट्री अपनी डायरी में दर्ज करते हैं, लेकिन इसी प्रक्रिया को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि प्रतिदिन गुजरने वाले वाहनों की संख्या वास्तविकता से कम दर्ज किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि ऐसा है तो इससे न केवल राजस्व और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि खनन गतिविधियों की पारदर्शिता भी संदेह के घेरे में आ जाती है। वहीं दूसरी ओर ओवरलोड वाहनों का संचालन क्षेत्रवासियों की सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। भारी भरकम और क्षमता से अधिक लदे वाहन सड़कों पर दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ाने के साथ-साथ सड़क को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके बावजूद संबंधित विभागों की प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देने से लोगों में नाराजगी है। क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि खनन माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए कुछ स्तरों पर मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवालों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शासन-प्रशासन और वन विभाग के उच्चधिकारियों को इस मामले का संज्ञान लेकर वन चौकी के अभिलेखों, सीसीटीवी फुटेज तथा वाहनों के वास्तविक आवागमन की जांच करानी चाहिए। यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। खनन क्षेत्र में ओवरलोडिंग और वाहनों की एंट्री से जुड़े सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि कहीं न कहीं निगरानी व्यवस्था में खामियां हैं। अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इन चर्चाओं को महज अफवाह मानकर नजरअंदाज करते हैं या फिर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाते हैं।









