पांच दिन, पांच चिताएं, पांच बार रोई इंसानियत
क्रांतिकारी शालू सैनी निभाती हैं आखिरी सांस तक का रिश्ता

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(इमरान देशभक्त) रुड़की। अब तक छह हजार से अधिक लावारिस शवों की सम्मानजनक अंतिम विदाई करने वाली लावारिसों की वारिस क्रांतिकारी शालू सैनी किसी का बेटा बनकर तो किसी की बेटी बनकर निभा रही हैं इंसानियत का फर्ज। इस दुनिया में जन्म लेने वाला हर इंसान कभी न कभी किसी का बेटा, किसी की बेटी, किसी का पिता, किसी की मां या किसी का अपना होता है, लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द शायद वह होता है, जब मौत के बाद भी किसी को चार कंधे नसीब नहीं होते।जब अंतिम सांसों के बाद आंखें हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं, मगर इंतजार रहता है किसी अपने का कि कोई आए, सिरहाने खड़ा हो, आंसू बहाए और पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दे, किन्तु कुछ बदनसीब जिंदगियों को यह नसीब भी हासिल नहीं होता।ऐसे ही बेसहारा और बेनाम लोगों के लिए मुजफ्फरनगर में एक महिला उम्मीद की रोशनी बनकर खड़ी है। नाम है शालू सैनी, जिन्हें दुनिया ‘लावारिसों की वारिस’ के नाम से जानती है। पिछले पांच दिनों में जनपद के अलग-अलग थाना क्षेत्रों से पांच मृतकों के संबंध में सूचना मिली।पांच अलग-अलग मौतें, पांच अनजान चेहरे और पांच ऐसी अंतिम यात्राएं, जिनमें अपनों की जगह एक ऐसी महिला मौजूद थी, जिसका उन मृतकों से खून का कोई रिश्ता नहीं था।सूचना मिलते ही क्रांतिकारी शालू सैनी ने आगे बढ़कर पांचों मृतकों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई।मृतकों का जो भी धर्म था,उसी के अनुरूप पूरे विधि-विधान और धार्मिक परंपराओं के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया, जिनके अंतिम सफर में शायद कोई अपना शामिल होने वाला नहीं था, उनके लिए शालू सैनी ने परिवार का फर्ज निभाया।पांच दिनों में पांच अंतिम संस्कार यह आंकड़ा नहीं, पांच अधूरी कहानियों का दर्द है। जरा सोचिए, उन पांच लोगों के जीवन में कितने रिश्ते रहे होंगे, कितने अपने रहे होंगे, कितनी यादें रही होंगी। मगर अंतिम समय में जब कोई साथ नहीं था,तब शालू सैनी ने उन्हें पराया नहीं समझा। उन्होंने यह साबित किया कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, कभी-कभी इंसानियत भी किसी को अपना बना लेती है। कोरोना महामारी के उस खौफनाक दौर में, जब लोग अपनों के शवों के पास जाने से भी डर रहे थे, उसी समय शालू सैनी ने लावारिस मृतकों को सम्मानजनक अंतिम विदाई देने का बीड़ा उठाया था।आज उनका यह सेवा अभियान एक ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं। कोरोना काल से अब तक वह छह हजार से भी अधिक लावारिस और बेसहारा मृतकों का अंतिम संस्कार कर उन्हें मोक्ष की राह तक पहुंचाने का प्रयास कर चुकी हैं।उनकी संवेदनशीलता केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है।साल में एक बार आने वाले पितृपक्ष और श्राद्ध के अवसर पर भी वह उन सभी दिवंगत आत्माओं को नहीं भूलतीं। जिनका नाम तक शायद किसी को याद नहीं, जिनकी अस्थियों और स्मृतियों को संभालने वाला कोई नहीं, उनकी आत्मा की शांति के लिए शालू सैनी हवन-यज्ञ, पिंडदान और धार्मिक अनुष्ठान भी पूरे विधि-विधान से करती हैं। एक सवाल समाज से भी है क्या किसी इंसान की जिंदगी का अंत इतना अकेला होना चाहिए कि उसकी चिता को अग्नि देने वाला भी कोई न मिले?क्या मरने के बाद सम्मान पाना भी किसी के परिवार और पहचान पर निर्भर होना चाहिए।शालू सैनी का पांच दिनों में पांच अंतिम संस्कार का यह सिलसिला समाज को आईना दिखाता है।वह उन लोगों के लिए बेटी बनती हैं, जिनकी बेटियां दूर हैं। उन लोगों के लिए बेटा बनती हैं, जिनके बेटे साथ नहीं हैं और उन अनजान चेहरों के लिए परिवार बन जाती हैं, जिन्हें दुनिया ने लावारिस कहकर छोड़ दिया। शायद इसी का नाम सच्ची इंसानियत है, जब किसी अनजान की मौत पर भी अपना दिल रो पड़े और उसके अंतिम सफर को सम्मान देने के लिए कदम खुद-ब-खुद आगे बढ़ जाएं।









