प्रिंसिपल डॉ. ठाकुर ने प्रार्थना सभा को बनाया अध्यात्म बौद्धिक और संस्कार का जीवंत मंच
ग्रामीण सरकारी स्कूल में बौद्धिक, संस्कार और संगीत का अनूठा संगम

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(अमन ठठेरा) भीलवाड़ा। सरकारी विद्यालय की पहचान केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि अध्यात्म,संस्कार,संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के केंद्र भी बनते जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों को लेकर आम धारणा को बदलने की दिशा में भीलवाड़ा जिले के कोटड़ी उपखंड के सवाईपुर पंचायत में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आ रहा है। यहां प्रार्थना सभा अब केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं रही, बल्कि बौद्धिक, अध्यात्म, संगीत और संस्कारों से संगीतमय और जीवंत बन गई है। विद्यालय की प्रिंसिपल डॉ. प्रतिष्ठा ठाकुर ने प्रार्थना सभा को एक नए और रचनात्मक स्वरूप में विकसित करने की पहल की है। उनका प्रयास है कि विद्यार्थी शिक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं और भारतीय मूल्यों से भी जुड़े रहें। इसी सोच के साथ विद्यालय बौद्धिक, अध्यात्म और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को प्रार्थना सभा का हिस्सा बनाया गया है।
प्रार्थना सभा में जब विद्यार्थियों की सामूहिक आवाज गूंजती हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन वातावरण को संगीतमय बनाती है, तो विद्यालय का सकारात्मक वातावरण और शिक्षक और शिक्षार्थी के दिन की शुरुआत बहुत ऊर्जावान होती है। छात्र-छात्राएं इसमें पूरे उत्साह और रुचि के साथ भाग ले रहे हैं। विद्यालय के विद्यार्थी और स्टाफ विभिन्न पारंपरिक एवं आधुनिक वाद्य यंत्रों का उपयोग कर इन प्रस्तुतियों को और प्रभावी बना रहे हैं। इससे विद्यार्थियों में संगीत के प्रति रुचि के साथ-साथ मंच पर प्रस्तुति देने का आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
इस नवाचार की खास बात यह है कि प्रिंसिपल डॉ. प्रतिष्ठा ठाकुर स्वयं विद्यार्थियों के साथ संगीत में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। वे गिटार, पियानो और कांगो जैसे वाद्य यंत्र बजाकर विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाती हैं।प्रधानाचार्य का यह प्रयास विद्यार्थियों के लिए केवल संगीत सीखने का अवसर नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के बीच आत्मीय संबंध को मजबूत करने वाला माध्यम भी बन रहा है।
विद्यालय की इस पहल ने यह संदेश दिया है कि ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी विद्यालय भी रचनात्मक नवाचार, संस्कार और आधुनिक शिक्षा के बेहतर समन्वय का केंद्र बन सकते हैं। विद्यालय परिवार के सामूहिक प्रयास से प्रार्थना सभा अब विद्यार्थियों के लिए दिन की शुरुआत का ऐसा अवसर बन रही है, जिसमें प्रार्थना के साथ संगीत, संस्कृति, अनुशासन, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। प्रधानाचार्य के नवाचारों में आगे बढ़कर सहयोग देता है उनका ऊर्जावान स्टाफ।
डॉ. ठाकुर और विद्यालय स्टाफ के इस नवाचार की क्षेत्र के ग्रामीणो द्वारा सराहना की जा रही है। अभिभावकों और ग्रामीणों का मानना है कि इस तरह की पहल से बच्चों में अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति जुड़ाव बढ़ेगा तथा सरकारी विद्यालयों के प्रति सकारात्मक सोच भी मजबूत होगी।
यह पहल दूसरे ग्रामीण सरकारी विद्यालयों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है। जहां शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहकर संस्कार, संस्कृति, कला और प्रतिभा के विकास का माध्यम बने। प्रिंसिपल डॉ. ठाकुर का मानना है कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्य सांस्कृतिक चेतना और सकारात्मक सोच का विकास भी उतना ही आवश्यक है और इसी सोच के साथ विद्यालय में प्रार्थना सभा को एक साथ रचनात्मक और प्रेरणादायक स्वरूप दिया गया है।
डॉ. ठाकुर की यह पहल यह संदेश देती है कि यदि विद्यालय नेतृत्व सकारात्मक सोच और नवाचार के साथ कार्य करें तो सरकारी स्कूल भी शिक्षा और संस्कारों के उत्कृष्ट केंद्र बन सकते हैं। जहां प्रत्येक दिन की शुरुआत संगीतमय प्रार्थना से होती है,वहां शिक्षा के साथ संस्कारों की धुन भी बच्चों के मन में उतरती है। भीलवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्र से शुरू हुई यह पहल आने वाले समय में अन्य विद्यालयों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकती है।
इस पूरी मुहिम और बदलाव में विद्यालय की पूरी स्टाफ टीम का बराबर सकारात्मक सहयोग और साथ मिल रहा है इसी के अलावा विद्यालय के सद्मक और छात्र-छात्राओं कभी सहयोग मिल रहा है।









