भू-माफियाओं के हौसले बुलंद या जिम्मेदार विभागों की अनदेखी, ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से की निष्पक्ष जांच की मांग
मोहम्मद आरिफ उत्तराखंड क्राइम प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। सलेमपुर और दादूपुर गोविंदपुर गांव में ग्राम समाज की भूमि पर कथित अवैध कब्जों को लेकर क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है। ग्रामीणों के बीच यह मामला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा हैं कि भू-माफियाओं ने ग्राम समाज की जमीनों को ही नहीं, बल्कि कब्रिस्तान, श्मशान घाट, तालाब और यहां तक कि ईदगाह की भूमि को भी अतिक्रमण की जद में ले लिया है। चर्चाओं के अनुसार, दोनों गांवों में कभी कई सैकड़ों बीघा ग्राम समाज की भूमि हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ सरकारी जमीनों पर कब्जे होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में ग्राम समाज की जमीनों पर कथित कब्जे कैसे होते चले गए, क्या संबंधित विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों ने समय रहते इन मामलों को गंभीरता से नहीं लिया, या फिर शिकायतों के बावजूद जानबूझकर आंखें मूंदे रखी गई। क्षेत्र में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कुछ पूर्व व मौजूदा जनप्रतिनिधियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में बिना दस्तावेजी जांच के किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन सरकारी भूमि पर कब्जे की शिकायतों को नजरअंदाज करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हैरानी की बात यह है कि ग्रामीणों के मुताबिक पूर्व में भी संबंधित अधिकारियों और विभागों को शिकायतें दी जा चुकी हैं, मामला मीडिया में भी उछल चुका है लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं देने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। ग्रामीणों में चर्चा है कि यदि सरकारी अभिलेखों और राजस्व दस्तावेजों के आधार पर समय रहते जांच की जाए तो ग्राम समाज की वास्तविक भूमि और उस पर हुए कथित कब्जों की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। लेकिन ईमानदारी के साथ। क्योंकि अवैध कब्जे सरकारी अधिकारी व कर्मचारीयों के गठजोड़ के बिना संभव नहीं हो सकते हैं। और अब सलेमपुर और दादूपुर गोविंदपुर की आवाम शासन-प्रशासन से मांग कर रही है कि दोनों गांवों में ग्राम समाज की भूमि, कब्रिस्तान, श्मशान घाट, तालाब और ईदगाह की जमीनों का राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमांकन कराया जाए। जहां भी अवैध कब्जे प्रमाणित हों, वहां नियमानुसार अतिक्रमण हटाकर जमीन को कब्जामुक्त कराया जाए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों की चर्चाएं गर्मा रही हैं। और सरकारी जमीनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन विभागों पर है, उनसे जवाबदेही कौन तय करेगा। यदि जांच में किसी भू-माफिया, जनप्रतिनिधि, अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता सामने आती है तो उसके पद और प्रभाव की परवाह किए बिना उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। सरकारी भूमि किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं, बल्कि समाज की धरोहर होती है। कब्रिस्तान, श्मशान घाट, तालाब और ईदगाह जैसी सार्वजनिक एवं सामुदायिक उपयोग की जमीनों की सुरक्षा करना प्रशासन का नैतिक और कानूनी दायित्व है। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन चर्चाओं और ग्रामीणों की इस मांग पर कब संज्ञान लेता है और कागजों में दर्ज सरकारी जमीन को वास्तव में भू-माफियाओं के कथित कब्जों से मुक्त कराने के लिए क्या कदम उठाता है। यह भी अपने आप में बड़े सवाल है।









