परिक्रमा ने आयोजित की कवि गोष्ठी, रोटी की तलाश में बचपन खो गया
चिराग कुमार हरिद्वार संवाददाता
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(चिराग कुमार) हरिद्वार। परिक्रमा सचिव शशिरंजन ‘समदर्शी’ की रचना- ‘संसद में संवाद शुरु है, नारी है जिसका उन्वान, प्राची प्रकट हुई भारत में लेकर एक नया दिनमान’ के साथ शुरु हुई, परिक्रमा साहित्यिक मंच की ओर से आयोजित कवि गोष्ठी में सामुदायिक केन्द्र, सैक्टर-चार भेल का सभागार देर शाम तक श्रोतागण की तालियों तथा वाह-वाहियों से गुंजायमान रहा। चेतना पथ संपादक कवि व साहित्यकार अरुण कुमार पाठक के अनुसार माँ सरस्वती के विग्रह के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन, माल्यार्पण, पुष्पार्पण तथा राज कुमारी ‘राजेश्वरी’ की वाणी वंदना के साथ आरम्भ हुई इस कवि गोष्ठी की अध्यक्षता वयोवृद्ध कवि व छंद विज्ञानी पं. ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ ने की तथा कुशल संचालन मदन सिंह यादव के हाथों में रहा। वरिष्ठ कवि भूदत्त शर्मा, ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’, गीतकार सुभाष मलिक, युवा जोश के कवि दिव्यांंश ‘दुष्यन्त’ तथा प्रभात रंजन ने गोष्ठी में अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं। गोष्ठी में शिरकत करते हुए कवियित्री रवीना राज की के ख़्याल की शिकायत’हर रोज की ज़ुस्तज़ू, ए दिल बता कहाँ-कहाँ से तेरी भरपाई करूँ’ में बेइन्तिहा कशिश दिखाई पड़ी। डाॅ० प्रशांत कौशिक का दर्द था- ‘एक अरसा हो गया पर कोई ना आया यहाँ, महबूब और सरकार में गठजोड़ शायद हो गया। कवियित्री चित्रा शर्मा ‘वीथिका’ ने नारी मन की वेदना यूँ प्रकट की- ‘मैं स्त्री हूँ, नभ की भटकी श्यामल बदली, जहाँ ठहर जाऊँ, सपनों का आशियाना थम जाता है।’ मदन सिंह यादव ने चेताया- ‘वह बुद्धिमान है, इसका उसे ज्ञान है, शायद इसीलिए अभिमान है।’ डाॅ० अशोक गिरि ने- ‘रोटी की तलाश में बचपन खो गया नंगे पांव चलकर जीवन सो गया’, के साथ अभावग्रस्त बच्चों की व्यथा रखी, तो देवेन्द्र मिश्र ने- ‘दीप मेरे मन का कभी बुझ न पाया, चाहें जीवन में कितना भी तूफ़ान आया’ के साथ ख़ुद की तथा राजकुमारी ‘राजेश्वरी’ ने- ‘जब उड़ती हूँ तो पाखी नहीं, मैं नभ होती हूँ’ के साथ नारी शक्ति व उसके मनोबल की बात की।









