लक्सर

उत्तराखंड में हाथियों की गणना को लेकर तैयारियां तेज, 20 से 30 मई तक चलेगा विशेष अभियान

फिरोज अहमद समाचार सम्पादक

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(फिरोज अहमद) हरिद्वार। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में हाथियों की सटीक संख्या और उनकी गतिविधियों का वैज्ञानिक आंकलन करने के लिए वन विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। राज्यभर में 20 मई से 30 मई तक विशेष हाथी गणना अभियान चलाया जाएगा, जिसके तहत गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर डेटा संग्रह किया जाएगा। वन विभाग इस अभियान को Wildlife Institute of India (WII) के सहयोग से संचालित कर रहा है। इसके लिए विशेष सेंसस प्रोटोकॉल तैयार किया गया है, ताकि हाथियों की वास्तविक संख्या, उनके मूवमेंट और आवास क्षेत्रों का सटीक आकलन किया जा सके। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में कुमाऊं क्षेत्र के वन कर्मचारियों को हाथी गणना के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने कहा कि उत्तराखंड देशभर में हाथियों की समृद्ध आबादी के लिए जाना जाता है और यहां बड़ी संख्या में एशियाई हाथी पाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि फील्ड कर्मचारियों को यह प्रशिक्षण दिया गया कि हाथियों की गणना किस प्रकार की जाए, कौन-कौन से वैज्ञानिक प्रोटोकॉल अपनाए जाएं और डेटा संग्रह के लिए किस प्रकार के फॉर्मेट का उपयोग किया जाए। वन क्षेत्र दूर-दूर तक फैले होने के कारण कर्मचारियों को ऑनलाइन माध्यम से भी जोड़ा जा रहा है, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में रहते हुए प्रशिक्षण और जरूरी जानकारी प्राप्त कर सकें। जानकारी के अनुसार, प्रत्येक चयनित क्षेत्र में पांच दिन तक विशेष प्रोटोकॉल लागू किया जाएगा। इस दौरान बीट अधिकारी अपने क्षेत्र में जाकर हाथियों की संख्या, उनके झुंड,नर-मादा अनुपात, बच्चों की संख्या और मूवमेंट से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज करेंगे। इसके लिए विशेष ट्रैकिंग फॉर्मेट और मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार किए गए हैं। वन विभाग के मुताबिक, फील्ड से जुटाए गए आंकड़ों का बाद में वैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाएगा। इसके आधार पर प्रदेश में हाथियों की कुल संख्या, उनकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों और उनके मूवमेंट पैटर्न की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी। वन विभाग का मानना है कि यह अभियान हाथियों के संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे न केवल हाथियों की गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने में भी सहायता मिलेगी। साथ ही राज्य में वन्यजीव संरक्षण की रणनीतियों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

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