
हरिद्वार की गूंज (24*7)
(फिरोज अहमद) हरिद्वार। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, लेकिन जब यही युवा रोजगार के लिए भटकने लगें तो यह चिंता का विषय बन जाता है। आज बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट का रूप लेती जा रही है। शहरों से लेकर गांवों तक लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। हर साल बड़ी संख्या में युवा स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों से शिक्षा पूरी कर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। उनके पास डिग्रियां हैं सपने हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी है लेकिन रोजगार के सीमित अवसर उनकी उम्मीदों को तोड़ रहे हैं। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक अटकी रहती है, परीक्षाएं रद्द हो जाती हैं या फिर पदों की संख्या बेहद कम होती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में भी स्थायी और सुरक्षित रोजगार के अवसर लगातार घटते दिखाई दे रहे हैं।
सबसे अधिक चिंता उस स्थिति को लेकर है जहां योग्य युवा अपनी क्षमता से कहीं छोटे काम करने को मजबूर हैं। इंजीनियर, स्नातक और परास्नातक डिग्रीधारी युवा मामूली नौकरियों के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं। यह स्थिति केवल युवाओं की निराशा नहीं बढ़ाती, बल्कि देश की प्रतिभा और संसाधनों की बर्बादी भी दर्शाती है। बेरोजगारी का असर केवल आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहता लंबे समय तक नौकरी न मिलने से युवाओं में तनाव अवसाद और असुरक्षा की भावना बढ़ती है कई बार यही निराशा उन्हें गलत रास्तों की ओर भी धकेल देती है। समाज में बढ़ते अपराध, नशाखोरी और सामाजिक असंतोष के पीछे बेरोजगारी भी एक बड़ा कारण मानी जाती है ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर है। खेती पर बढ़ते खर्च और घटती आय के कारण गांवों से बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, लेकिन शहरों में भी रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है। परिणामस्वरूप अस्थायी मजदूरी और कम आय वाले काम ही उनके सामने विकल्प बनते जा रहे हैं।सरकारें रोजगार सृजन के दावे जरूर करती हैं, लेकिन जरूरत केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस परिणामों की है। शिक्षा व्यवस्था को रोजगारपरक बनाना होगा। कौशल विकास योजनाओं को केवल प्रमाण पत्र तक सीमित रखने के बजाय उद्योगों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। छोटे उद्योगों, स्टार्टअप और स्वरोजगार को बढ़ावा देकर नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसके साथ ही भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और समयबद्धता बेहद जरूरी है। जब युवाओं को मेहनत के बावजूद अवसर नहीं मिलता, तो व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा कमजोर होने लगता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके युवाओं की ऊर्जा और विश्वास पर निर्भर करती है। भारत के युवाओं के पास प्रतिभा की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें सही दिशा और अवसर देने की है। यदि बेरोजगारी की चुनौती का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो यह देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।









