देहरादून

होली सनातन विज्ञान और परंपरा का उत्सव: श्वेता शर्मा

राजेश पसरीचा देहरादून प्रभारी

हरिद्वार की गूंज (24*7)
(राजेश पसरीचा) देहरादून। भारतीय सनातन संस्कृति अपने आप में इतनी उच्च और दिव्य है कि यहाँ हर त्यौहार जीवन का उत्सव बन जाता है। जिसमें हर कोई छोटा बड़ा त्यौहारों की बेसब्री से इंतजार करता है। त्यौहार के शुभ अवसर पर हर कोई एक दूसरे के साथ खुशियां बांटता है।
यहाँ ईश्वर की पूजा केवल कुछ पाने के लिए नहीं की जाती, बल्कि मन की शांति और सच्चे आनंद के लिए भी की जाती है। वहीं होली पर्व पर गुलाल, टेसू के फूलों की सौंधी खुशबू और चारों ओर छाई हरियाली-आरंभ से भारतवर्ष में होली का माहौल कुछ ऐसा ही होता है। रंग से भीगी गलियाँ, हँसी से भरे आँगन और ढोलक-मंजीरे की थाप पर थिरकते कदम, हर दृश्य अपने आप में उत्सव बन जाता है। होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन का स्वागत है। खेतों में नई बालियाँ लहलहाने लगती हैं, हर पेड़ पर नईं कोपल आ जाती है और हवा में बसंत की ताजगी घुल जाती है। इसी आनंद में लोग गुलाल और रंगों से होली खेलते हैं। जैसे प्रकृति के सुंदर श्रृंगार करने की खुशी मना रहे हो।
होलिका दहन में उपले और घी का प्रयोग केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक आधार भी रखता है। गोबर से बने उपले जब घी के साथ जलते हैं काफी मात्रा में धुआं निकलता है और वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को कम करने में सहायक माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो घी के दहन से निकलने वाली वाष्प और उपलों के जैविक तत्व मिलकर वायु को अपेक्षाकृत शुद्ध बनाते हैं। जिससे ऑक्सीज बनती है। वास्तव में हमारे पूर्वज वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही रखते थे। ग्रामीण समाज में इसे सरल शब्दों में हवा का शुद्ध होना कहा जाता रहा है। यही कारण है कि होलिका की अग्नि खुली जगह पर जलाई जाती है, ताकि उसका प्रभाव पूरे वातावरण में फैल सके। इस अग्नि में नई फसल की बालियाँ, अन्न, मखाने इलायची और अन्य वस्तुएँ समर्पित की जाती है। होलिका में नए अन्न, बालियाँ, मखाने, चना, जौ आदि चढ़ाने का ज्योतिषीय अर्थ यह है कि इस समय पृथ्वी तत्व सक्रिय होता है। नई फसल पृथ्वी की ऊर्जा का प्रत्यक्ष रूप है। इन्हें अग्नि में समर्पित करना यह दर्शाता है कि पृथ्वी से प्राप्त अन्न को अग्नि तत्व के माध्यम से सूर्य को अर्पित किया जा रहा है। यह पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संतुलन का प्रतीक है। मखाने विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं क्योंकि ज्योतिष में इन्हें चंद्र से संबंधित सात्त्विक आहार माना गया है। चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है। फाल्गुन पूर्णिमा को मखाना अर्पित करने से आने वाले समय में मन स्थिर रहे,भावनात्मक असंतुलन न बढ़े। उस समय यह भाव रहता है कि अब खेतों का श्रम पूर्ण हुआ और प्रकृति ने अपना फल दिया। पहले इन्हें अग्नि को अर्पित किया जाता है, फिर अगले दिन उसी शुद्ध वातावरण में रंगों की होली खेली जाती है। वास्तव में हमारा सनातन धर्म कितना उच्च है जहां हर त्यौहार हर रस्म का कोई ना कोई वैज्ञानिक आधार आवश्यक है जो मानव जाति के लिए कल्याण कारक सिद्ध होता है। यह क्रम बताता है कि पहले शुद्धि, फिर उत्सव पहले संतुलन, फिर आनंद। यही होली की परंपरा की मूल समझ है, जहाँ उत्सव भी अनुशासन से जुड़ा है और आनंद भी प्रकृति के नियमों के साथ चलता है। भारत में होली के रंग हमेशा से प्राकृतिक रहे हैं। हल्दी, चंदन, टेसू, पलाश और फूलों से बने रंग केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के अनुकूल भी थे। यह हल्दी में जीवाणुनाशक गुण होते हैं, चंदन शरीर को ठंडक देता है, और टेसू के फूल त्वचा तथा रक्त संचार के लिए लाभकारी माने जाते हैं। इन रंगों के प्रयोग से त्वचा को नुकसान नहीं होता था, बल्कि मौसम के बदलाव से होने वाली समस्याओं से शरीर की रक्षा होती थी।

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