हरिद्वार की गूंज (24*7)
(जावेद अंसारी) हरिद्वार। आज के समय में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें धीरे-धीरे सेवा से ज्यादा व्यापार का रूप लेती जा रही हैं। जो शहर में एक चर्चा का विषय बना हुआ है। प्राइवेट अस्पताल और स्कूल, जो कभी समाज की रीढ़ माने जाते थे, अब आम आदमी के लिए चिंता और बोझ का कारण बनते जा रहे हैं।
प्राइवेट अस्पताल: इलाज या मुनाफे का खेल?
प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की बढ़ती लागत ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। मामूली बीमारी के इलाज में भी हजारों से लाखों रुपये तक का बिल थमा दिया जाता है। कई जगहों पर अनावश्यक जांच, महंगी दवाइयां और बेवजह भर्ती करने जैसी शिकायतें सामने आती रहती हैं। इमरजेंसी में मरीज को भर्ती करने से पहले एडवांस फीस की मांग, सरकारी योजनाओं (जैसे आयुष्मान कार्ड) का सही लाभ न देना, डॉक्टरों द्वारा कमीशन आधारित टेस्ट और दवाइयों का प्रिस्क्रिप्शन, ये सब सवाल खड़े करते हैं कि क्या स्वास्थ्य सेवा अब केवल पैसे वालों के लिए ही रह गई है?
प्राइवेट अस्पतालों में एक और गंभीर समस्या सामने आती है—छोटी सी बीमारी को भी बड़ा बनाकर दिखाना। कई मामलों में मरीज को हल्की परेशानी होने पर भी डॉक्टर दर्जनों महंगे टेस्ट लिख देते हैं।
मामूली बुखार या दर्द में भी लंबी टेस्ट लिस्ट थमा दी जाती है अनावश्यक ब्लड टेस्ट, स्कैन और अन्य जांचें कराई जाती हैं, इन टेस्टों के पीछे अक्सर लैब्स से कमीशन का खेल होने की बातें सामने आती हैं इसका सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। जो व्यक्ति रोज़ कमाकर अपना घर चलाता है, उसके लिए ये खर्च किसी बोझ से कम नहीं होता। इलाज के नाम पर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाना कहीं न कहीं “सेवा” की भावना पर सवाल खड़ा करता है।
प्राइवेट स्कूल: शिक्षा का व्यवसायीकरण
शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। प्राइवेट स्कूलों में हर साल फीस में मनमानी बढ़ोतरी, किताबों और यूनिफॉर्म पर अतिरिक्त बोझ, और विभिन्न फालतू चार्जेस से अभिभावक परेशान हैं। एडमिशन फीस, डेवलपमेंट फीस, एक्टिविटी फीस जैसे कई छुपे हुए खर्च, एक ही दुकान से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने की मजबूरी फीस न देने पर बच्चों को मानसिक दबाव और अपमान शिक्षा, जो हर बच्चे का अधिकार है, अब एक महंगी सुविधा बनती जा रही है।









