हरिद्वार की गूंज (24*7)
भारत वह देश है जहाँ सदियों से ही शिक्षा और संस्कार प्राप्त करने के लिए गुरुकुलों को ज्ञान का पवित्र केंद्र माना गया है। वहाँ शिक्षा केवल मस्तिष्क का विस्तार नहीं, बल्कि आत्मा का उत्कर्ष थी। परंतु, आज के युग में शिक्षा का जो स्वरूप हम देख रहे हैं, वह केवल डिग्रियों का एक बोझिल ढेर बनकर रह गया है, जिसके कारण हमारी युवा पीढ़ी दिशाहीन और हताश है। यदि हम पौराणिक काल की ओर दृष्टि डालें, तो शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला थी। उन दिनों गुरुकुल पद्धति में शिक्षा का आधार ‘धर्म’ और ‘चरित्र’ होता था। जब बालक गुरुकुल में प्रवेश करता था, तो वह केवल विद्या ही नहीं, बल्कि सत्य, संयम, सेवा और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ता था। गुरु के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त कर जब शिष्य बाहर निकलता था, तो वह पूर्णतः एक सक्षम और आत्मविश्वास से भरा हुआ पुरुषार्थी नागरिक होता था। उस समय शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को समाज के लिए एक उपयोगी और समर्थ मानव बनाना था, जो अपनी योग्यता के बल पर अपनी आजीविका चलाने के साथ-साथ समाज के कल्याण हेतु तत्पर रहता था। वहाँ की शिक्षा प्रणाली में कौशल के साथ-साथ संस्कारों का ऐसा समावेश था कि शिष्य कभी भी असहाय महसूस नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें सांसारिक चुनौतियों से लड़ने का आत्मबल बचपन से ही प्रदान कर दिया जाता था।
इसके विपरीत, आज की शिक्षा पद्धति ने मनुष्य को एक ऐसी मशीन बना दिया है जो केवल प्रतिस्पर्धी दौड़ में भागने के लिए अभिशप्त है। आज शिक्षा के इतने साधन और उच्च डिग्रियां होने के बाद भी, युवा वर्ग हताशा और बेरोजगारी के गहरे अंधेरे में धकेला जा रहा है। इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि आज की शिक्षा प्रणाली में आरक्षण की विसंगतियों और अंधी प्रतिस्पर्धा ने अवसरों को सीमित कर दिया है, जिससे मेधावी छात्र भी अपनी योग्यता का उचित मूल्य न मिलने पर कुंठित हो रहे हैं। डिग्रियों के पीछे भागते-भागते आज का युवा अपनी नैतिकता और धैर्य खो चुका है। जब एक छात्र वर्षों की कड़ी पढ़ाई के बाद भी स्वयं को बेरोजगार पाता है, तो उसके भीतर का साहस टूटने लगता है और मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि वह छोटी-छोटी असफलताओं को जीवन की अंतिम सीमा मानकर आत्महत्या जैसी आत्मघाती राहें चुनने लगा है। यह स्पष्ट संकेत है कि आज की शिक्षा प्रणाली केवल मस्तिष्क को बोझिल कर रही है, लेकिन आत्मा को वह शक्ति नहीं दे पा रही जो विकट परिस्थितियों में भी उसे अडिग रख सके। आज का माहौल अत्यंत चिंताजनक हो गया है, जहाँ शिक्षा का अर्थ केवल ‘नौकरी का जरिया’ रह गया है, न कि ‘जीवन का आधार। प्राचीन काल के गुरुकुल में शिष्य को शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी जाती थी, जिससे वह बौद्धिक रूप से भी प्रखर होता था और शारीरिक एवं मानसिक रूप से भी दृढ़ होता था। आज की शिक्षा में नैतिकता, धैर्य और आध्यात्मिकता का पूर्ण अभाव है। हम बच्चों को इतिहास, भूगोल और विज्ञान तो पढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें ‘मन की शक्ति’ और ‘जीवन का मूल्य’ नहीं समझा पा रहे हैं। यही कारण है कि आज की शिक्षा पद्धति संस्कारों से विहीन है, जिसके चलते अपराध, स्वार्थ और संवेदनहीनता का वातावरण पनप रहा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल व्यक्ति बनाना नहीं है, बल्कि एक ऐसा मनुष्य तैयार करना है जो स्वयं के साथ-साथ समाज को भी सही दिशा दे सके। यदि आज हम इस दिशा में नहीं सुधरे, तो शिक्षा का यह तंत्र आने वाली पीढ़ियों को और भी अधिक खोखला और मानसिक रूप से बीमार बना देगा। समय की मांग है कि हम आधुनिक शिक्षा में पुनः उन प्राचीन संस्कारों की नींव रखें, जो मनुष्य को विषम परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देते, बल्कि उसे संघर्ष कर पुनः खड़े होने की प्रेरणा देते हैं। शिक्षा को पुनः ‘सा विद्या या विमुक्तये’ के ध्येय पर आधारित करना होगा, ताकि हमारा युवा डिग्रियों के कागजों के बीच अपनी पहचान न खोए, बल्कि अपनी योग्यता और संस्कारों के प्रकाश से विश्व को नई दिशा प्रदान करे। तभी हम इस समाज को आत्महत्या और कुंठा के अंधकार से बाहर निकालकर एक सुखद और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा पाएंगे।









